नितिन गडकरी बोले: “पैसा कमाना गलत नहीं, लेकिन राजनीति को पैसा कमाने का ज़रिया बनाना गलत है”

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BY: Yoganand shrivastva

नई दिल्ली, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने शुक्रवार को अपनी नई पुस्तक ‘संघातील मानवीय व्यवस्थापन’ के विमोचन समारोह में अपने अनुभवों और विचारों को साझा किया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर भी मौजूद थे।

इस अवसर पर गडकरी ने जीवन में धन अर्जन और राजनीति के संबंध को लेकर स्पष्ट राय रखी। उन्होंने कहा, “पैसा कमाना कोई अपराध नहीं है। मैं अपने साथियों को भी यही कहता हूं कि उन्हें ईमानदारी से पैसा कमाना चाहिए। लेकिन राजनीति को केवल पैसे कमाने का साधन बनाना बिल्कुल गलत है।”

ई-रिक्शा लाने को बताया सबसे बड़ी उपलब्धि

नितिन गडकरी ने बताया कि सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कई बड़े फैसले लिए, लेकिन उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसला साइकिल रिक्शा की जगह ई-रिक्शा को बढ़ावा देना रहा। उन्होंने कहा, “साइकिल रिक्शा में एक इंसान को दूसरे इंसान को खींचना पड़ता था, जो अमानवीय था। इसे हटाकर हमने तकनीक और करुणा का मेल किया।”

उन्होंने बताया कि 2014 में केंद्रीय मंत्री बनने के बाद उनका पहला लक्ष्य यही था कि यह अमानवीय व्यवस्था बंद हो। इसके लिए अगर कानून तोड़ना भी पड़ता, तो वे पीछे नहीं हटते। “मैंने तय कर लिया था कि जरूरत पड़े तो दस बार कानून तोड़ूंगा, लेकिन यह शोषण बंद कराऊंगा।”

“न मैं होशियार था, न मेरिट में था”

गडकरी ने अपने छात्र जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे न तो पढ़ाई में अव्वल थे और न ही किसी विशेष योग्यता वाले छात्र। उन्होंने कहा, “मैं न मेरिट में रहा और न ही खुद को बहुत ज्ञानी मानता हूं। मैं उन लोगों में से हूं जो थिएटर पीछे से देखते हैं और फिल्म सामने से। 12वीं में केवल 52 प्रतिशत अंक मिले थे और मैं इंजीनियरिंग में प्रवेश की पात्रता भी नहीं रखता था।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे जल्द ही देहरादून विश्वविद्यालय से 13वां डीलिट (डॉक्टरेट की उपाधि) प्राप्त करेंगे, लेकिन खुद को डॉक्टर कहना उन्हें उचित नहीं लगता।

“अगर ज्यादा सोचता, तो सरकारी नौकर बन जाता”

नितिन गडकरी ने कहा कि वे जीवन में निर्णय लेने में डरते नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अगर मैं ज़्यादा सोचता, तो किसी सरकारी विभाग में नौकरी कर रहा होता। लेकिन मैंने जोखिम उठाने का साहस दिखाया और यही मेरी असली पूंजी है।” उन्होंने खुद को “डेयरडेविल” कहते हुए बताया कि उनका आत्मविश्वास ही उन्हें आगे बढ़ाता रहा।

“खाली पेट को दर्शन नहीं समझाया जा सकता”

गडकरी ने स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए कहा, “खाली पेट को दर्शन नहीं सिखाया जा सकता।” इसी बात को ध्यान में रखते हुए वे हमेशा लोगों को आत्मनिर्भर बनने और मेहनत से जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं।

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