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व्हाइट हाउस में दो विवादित नियुक्तियाँ: एक लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा, दूसरा जेहादी सोच वाला विद्वान?

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BY: Yoganand Shrivastva

वॉशिंगटन। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के एक हालिया कदम ने वैश्विक मंच पर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका के “ले लीडर्स एडवाइजरी बोर्ड” नामक एक सलाहकार समिति में दो ऐसे व्यक्तियों को जगह दी गई है जिनके अतीत को लेकर गंभीर आपत्तियाँ जताई जा रही हैं। इनमें से एक व्यक्ति पर सीधे लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन से जुड़ाव के आरोप हैं, जबकि दूसरे की विचारधारा और पुराने बयान विवादों में घिरे रहे हैं।

धार्मिक सलाह के नाम पर विवादित नियुक्तियाँ

व्हाइट हाउस द्वारा गठित इस समिति का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और विश्वास-आधारित नीतियों पर प्रशासन को सलाह देना है। हालांकि इस बोर्ड में दो मुस्लिम नेताओं की नियुक्ति ने सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

1. इस्माइल रॉयर: पूर्व चरमपंथी, लश्कर से संबंध

इस्माइल रॉयर, जो अब अमेरिका में सेंटर फॉर इस्लाम एंड रिलीजियस फ्रीडम के निदेशक हैं, अतीत में कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2000 में पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा के कैंप में आतंकी प्रशिक्षण लिया था और भारतीय सेना के खिलाफ अभियानों में भी शामिल रहे थे।

2003 में गिरफ्तारी और सजा:
उन्हें अमेरिका में आतंकवाद से संबंधित मामलों में दोषी ठहराया गया और 20 वर्षों की सजा सुनाई गई। उन्होंने करीब 13 साल जेल में बिताए। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने खुद को सुधारने और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने का दावा किया है।

2. शेख हमजा यूसुफ: उदारवादी विद्वान या कट्टरपंथी सोच के समर्थक?

हमजा यूसुफ को अमेरिका का प्रमुख इस्लामी विद्वान बताया गया है। वे कैलिफोर्निया स्थित ज़ैतूना कॉलेज के सह-संस्थापक हैं, जो देश का पहला मान्यता प्राप्त इस्लामी लिबरल आर्ट्स कॉलेज है। हालांकि उनकी छवि भी विवादों से अछूती नहीं रही।

विवादास्पद विचारधारा:
यूसुफ के कुछ पुराने बयान अमेरिका की विदेश नीति और इस्लामिक चरमपंथ पर तीखी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उनके आलोचकों का मानना है कि उनका झुकाव जेहादी सोच की ओर रहा है, जिससे उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़े हुए हैं।

भारत की चिंता: लश्कर से संबंध को लेकर सतर्कता

भारत की दृष्टि से यह मामला बेहद संवेदनशील है। लश्कर-ए-तैयबा को भारत में कई बड़े आतंकी हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, जिनमें 2001 का संसद हमला और 2008 का मुंबई हमला प्रमुख हैं। ऐसे में एक पूर्व लश्कर प्रशिक्षित व्यक्ति की अमेरिका के प्रशासनिक ढांचे में नियुक्ति को भारत ने एक गंभीर कूटनीतिक चूक माना है।

अमेरिकी समाज और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

ट्रंप प्रशासन के इस कदम की अमेरिका में भी तीखी आलोचना हो रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विरोधियों का कहना है कि पूर्व चरमपंथियों को राष्ट्रपति स्तर की सलाहकार समिति में जगह देना देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।

ट्रंप प्रशासन का बचाव

ट्रंप कैंपेन की ओर से जारी बयान में इन नियुक्तियों को “धार्मिक सहिष्णुता” और “पुनर्वास की भावना” का प्रतीक बताया गया है। उनके अनुसार, यह समिति सभी धार्मिक समुदायों के बीच संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई है। इस्माइल और हमजा जैसे लोगों को शामिल करने का उद्देश्य यह दिखाना है कि परिवर्तन और सुधार संभव है।

क्या पुनर्वास और सार्वजनिक सेवा एक साथ चल सकते हैं?

इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या एक पूर्व आतंकवादी या कट्टरपंथी सोच वाला व्यक्ति समाज के लिए सार्वजनिक जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभा सकता है? यह भी विचारणीय है कि क्या इस प्रकार की नियुक्तियाँ चरमपंथ को अप्रत्यक्ष वैधता देती हैं?

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