क्या सुप्रीम कोर्ट बिल पास करने की डेडलाइन तय कर सकता है? राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पूछे ये 14 अहम सवाल

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BY: Yoganand Shrivastva

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: क्यों आया ये आदेश?राष्ट्रपति ने क्यों उठाए सवाल?राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सुप्रीम कोर्ट से पूछे गए 14 संवैधानिक सवाल1. अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास क्या संवैधानिक विकल्प हैं?2. क्या राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी जरूरी है?3. क्या राज्यपाल का विवेकाधिकार न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आता है?4. क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के कार्यों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है?5. क्या सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल के निर्णयों के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकता है?6. क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति का विवेक न्यायिक जांच के दायरे में है?7. क्या कोर्ट राष्ट्रपति के निर्णयों पर प्रक्रिया और समयसीमा तय कर सकता है?8. क्या विधेयक आरक्षित करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से राय लेनी चाहिए?9. क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय किसी कानून के प्रभाव में आने से पहले चुनौती दिए जा सकते हैं?10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत इन संवैधानिक शक्तियों को संशोधित कर सकता है?11. क्या बिना राज्यपाल की स्वीकृति के राज्य का कोई विधेयक कानून बन सकता है?12. क्या सुप्रीम कोर्ट की किसी पीठ को पहले यह तय करना चाहिए कि क्या मामला संविधान की गहरी व्याख्या से जुड़ा है और उसे 5 जजों की पीठ को भेजना चाहिए?13. क्या अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ऐसी शक्तियाँ रखता है जो संविधान या कानून से परे निर्देश जारी कर सकें?14. क्या संविधान सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 131 के अलावा अन्य रास्तों से संघ और राज्यों के विवाद सुलझाने की अनुमति देता है?मामला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?संविधान में शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा है:राष्ट्रपति का अनुच्छेद 143(1) का प्रयोग दुर्लभ:सुप्रीम कोर्ट का जवाब तय करेगा संविधान का भविष्य?

8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर समय-सीमा के भीतर निर्णय लेने की सलाह दी गई।

हालांकि इस फैसले को लेकर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गहरी संवैधानिक चिंता जताई है और इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट से 14 अहम सवाल पूछे हैं।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है, जो भारत के संवैधानिक ढांचे के लिए एक अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: क्यों आया ये आदेश?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, कई राज्यों में ऐसे मामले देखने को मिले हैं जहाँ विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपाल लंबे समय तक रोक कर रखते हैं, जिससे सरकार के विधायी कार्यों में रुकावट आती है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सुझाव दिया कि:

  • राज्यपाल और राष्ट्रपति निर्णय लेने में देरी न करें
  • विधेयकों पर निर्धारित समय के भीतर मंजूरी या अस्वीकृति दी जाए

हालांकि कोर्ट ने इसे आदेश के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और प्रक्रिया की आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया था।

राष्ट्रपति ने क्यों उठाए सवाल?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कोर्ट के इस फैसले को संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण बताते हुए कहा है कि न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, विशेषकर जब संविधान में स्पष्ट समयसीमा निर्धारित नहीं है।

इसी के चलते उन्होंने 14 सवाल सुप्रीम कोर्ट से पूछे हैं, जिनका उत्तर देश के संवैधानिक संतुलन को तय करने में महत्वपूर्ण होगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सुप्रीम कोर्ट से पूछे गए 14 संवैधानिक सवाल

1. अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास क्या संवैधानिक विकल्प हैं?

  • विधेयक को मंजूरी देना
  • अस्वीकार करना
  • पुनर्विचार के लिए भेजना
  • राष्ट्रपति के पास आरक्षित करना

2. क्या राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी जरूरी है?

3. क्या राज्यपाल का विवेकाधिकार न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आता है?

4. क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के कार्यों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है?

5. क्या सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल के निर्णयों के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकता है?

6. क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति का विवेक न्यायिक जांच के दायरे में है?

7. क्या कोर्ट राष्ट्रपति के निर्णयों पर प्रक्रिया और समयसीमा तय कर सकता है?

8. क्या विधेयक आरक्षित करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से राय लेनी चाहिए?

9. क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय किसी कानून के प्रभाव में आने से पहले चुनौती दिए जा सकते हैं?

10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत इन संवैधानिक शक्तियों को संशोधित कर सकता है?

11. क्या बिना राज्यपाल की स्वीकृति के राज्य का कोई विधेयक कानून बन सकता है?

12. क्या सुप्रीम कोर्ट की किसी पीठ को पहले यह तय करना चाहिए कि क्या मामला संविधान की गहरी व्याख्या से जुड़ा है और उसे 5 जजों की पीठ को भेजना चाहिए?

13. क्या अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ऐसी शक्तियाँ रखता है जो संविधान या कानून से परे निर्देश जारी कर सकें?

14. क्या संविधान सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 131 के अलावा अन्य रास्तों से संघ और राज्यों के विवाद सुलझाने की अनुमति देता है?

मामला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

संविधान में शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा है:

  • विधायिका कानून बनाती है
  • कार्यपालिका उसे लागू करती है
  • न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है

लेकिन जब अदालत खुद विधायी प्रक्रिया में समयसीमा तय करने लगे, तो ये संवैधानिक संतुलन पर सवाल खड़े करता है

राष्ट्रपति का अनुच्छेद 143(1) का प्रयोग दुर्लभ:

यह वही अनुच्छेद है जिसके तहत राष्ट्रपति अदालत से किसी संवैधानिक मुद्दे पर राय मांग सकते हैं। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जिससे ये मामला अत्यंत ऐतिहासिक बन गया है

सुप्रीम कोर्ट का जवाब तय करेगा संविधान का भविष्य?

राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए 14 सवाल सिर्फ विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संविधान के मूल ढांचे, शक्तियों के बंटवारे और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़े हैं।

अब देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की राय पर टिकी हैं — क्या न्यायपालिका अपने ही पिछले आदेश की वैधानिकता की पुनर्परिक्षा करेगी?

यह फैसला यह तय करेगा कि क्या न्यायपालिका की सीमा स्पष्ट होगी या एक नई संवैधानिक परंपरा की शुरुआत होगी।

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