नीले गले वाले का आशीर्वाद: एक मासूम की खोज

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महाशिवरात्रि की रात थी। मेला अपने चरम पर था—हवा में कपूर और चंदन की खुशबू, भक्तों के भजनों की मिठास, और मंदिर की घंटियों का ऐसा संगीत जो आत्मा को झकझोर दे। रंग-बिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे, और दूर-दूर से आए लोग शिव के दर्शन के लिए बेताब थे। इस भीड़ में एक नन्हा साहसी, मुन्ना, अपनी चपलता और उत्साह के साथ इधर-उधर दौड़ रहा था। उसकी माँ की पुकार, “मुन्ना, पास रहो!” उसके कानों तक पहुंचती, पर उसका मन मानो किसी अनजान зов की ओर खिंच रहा था।


नीले गले वाला रहस्यमयी साया

मुन्ना अचानक एक संकरी गली में जा पहुंचा, जहां मेले का शोर धीमा पड़ गया। वहां एक प्राचीन बरगद का पेड़ खड़ा था, जिसकी टहनियां आसमान को छू रही थीं और जड़ें धरती को गले लगा रही थीं। तभी उसकी नजर एक अनोखे व्यक्ति पर पड़ी। लंबा कद, शांत चेहरा, और गले पर नीला निशान—जैसे किसी ने चांद की रोशनी को उसकी त्वचा पर उकेर दिया हो। उसकी आंखों में सागर-सी गहराई थी, और होंठों पर हल्की मुस्कान।

“आ, ये ले,” उसने कहा और अपनी हथेली आगे बढ़ाई। उसमें तीन ताजे बेलपत्र थे, जिनकी खुशबू से हवा महक उठी। मुन्ना ने मंत्रमुग्ध होकर उन्हें ले लिया। उसकी आवाज़ ऐसी थी मानो पहाड़ों से बहती नदी बोल रही हो। मुन्ना कुछ पूछ पाता, इससे पहले ही वह नीले गले वाला व्यक्ति हवा में घुल गया—जैसे कोई सपना जो सुबह की धूप में गायब हो जाए।


मेले में हलचल और भक्ति की लहर

मुन्ना भागता हुआ माँ के पास पहुंचा और चिल्लाया, “अम्मा! एक नीले गले वाले अंकल ने मुझे ये दिए!” उसने बेलपत्र दिखाए। माँ ने पहले तो उसे झिड़की दी, “कहां चला गया था? झूठ मत बोल!” पर जब उसने बेलपत्रों को छुआ, उसकी सांसें थम गईं। वे इतने ताजे थे, मानो अभी-अभी पेड़ से तोड़े गए हों। मेले में बात आग की तरह फैली।

“ये तो नीलकंठ हैं!” एक बूढ़े भक्त ने कहा।
“बच्चे की पवित्रता ने शिव को प्रकट कर दिया!” दूसरा बोला।
लोग मुन्ना को घेरने लगे। उसकी बड़ी बहन रानी, जो थोड़ी शक्की मिजाज थी, ने पूछा, “मुन्ना, सच बता, वो कहां मिले?” मुन्ना ने अपनी छोटी उंगली से गली की ओर इशारा किया। परिवार और कुछ उत्साही भक्त उसके पीछे चल पड़े, जैसे कोई खजाना ढूंढने निकल पड़ा हो।


भूले हुए मंदिर का रहस्योद्घाटन

गली के अंत में बरगद का पेड़ तो था, पर उसकी जड़ों के नीचे कुछ और छिपा था। धूल और सूखे पत्तों से ढकी एक पुरानी सीढ़ी नीचे की ओर जा रही थी। सबने मिलकर रास्ता साफ किया। सीढ़ियां उतरते ही ठंडी हवा का झोंका आया, और सामने एक छोटा मंदिर प्रकट हुआ। दीवारों पर शिव की मूर्ति थी—उसके गले का नीला रंग अब भी चमक रहा था, जैसे सदियों की नींद के बाद जाग उठा हो। मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपक रही थीं, जो एक छोटे शिवलिंग पर गिरकर संगीत पैदा कर रही थीं।

मुन्ना की माँ की आंखों में आंसू छलक आए। उसने मुन्ना को सीने से लगाया और फुसफुसाई, “तूने हमें भगवान के पास पहुंचा दिया।” भक्तों ने मंदिर को झाड़ू से साफ किया, फूलों से सजाया, और दीपों की रोशनी से भर दिया।


एक भावुक अंत और चमत्कार की शुरुआत

उस रात महाशिवरात्रि की पूजा उस भूले हुए मंदिर में हुई। मुन्ना ने अपने नन्हे हाथों से बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाए। उसकी आंखों में एक चमक थी—न जाने उसे क्या दिखा था, पर उसकी मासूमियत ने सबके दिलों को छू लिया। मंदिर की शांति और भक्ति की लहर दूर-दूर तक फैल गई। लोग कहते हैं कि उस रात आसमान में चांद कुछ ज्यादा ही नीला चमका, जैसे नीलकंठ खुद मुन्ना की हंसी में शामिल हो गए हों।

और इस तरह, एक बच्चे की सच्चाई ने न सिर्फ एक मंदिर को जगा दिया, बल्कि भक्तों के विश्वास को भी नई रोशनी दे गई।

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