Diwali 2026: भारत में दिवाली यानी दीपावली का त्योहार बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। रोशनी का यह पर्व खुशियों, समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। दिवाली के आते ही घरों की साफ-सफाई, सजावट, दीपक जलाने और मिठाइयां बांटने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस दिन लोग अपने घरों को रोशनी से सजाते हैं और शाम को मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
हालांकि, दिवाली का महत्व केवल दीप जलाने और खुशियां मनाने तक सीमित नहीं है। इस पर्व के पीछे कई धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग अपनी परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार इस त्योहार को मनाते हैं। कहीं इसे भगवान श्रीराम के वनवास से लौटने की खुशी से जोड़कर देखा जाता है, तो कहीं मां लक्ष्मी के प्राकट्य और भगवान श्रीकृष्ण की विजय से इसका संबंध माना जाता है। जैन धर्म में भी इस दिन का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं दिवाली मनाने के पीछे प्रचलित 6 प्रमुख धार्मिक मान्यताओं के बारे में।
1. भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाती है दिवाली
दिवाली मनाने के पीछे सबसे लोकप्रिय धार्मिक मान्यता भगवान श्रीराम से जुड़ी हुई है। रामायण की कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपना 14 वर्षों का वनवास पूरा किया था। इसके बाद जब वे अयोध्या वापस लौटे, तो पूरी नगरी में उत्सव जैसा माहौल बन गया था। भगवान राम के स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने अपने घरों और रास्तों को दीपों से रोशन किया था। मान्यता है कि इसी खुशी में कार्तिक अमावस्या की रात दीप जलाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी दिवाली को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
2. समुद्र मंथन से हुआ था मां लक्ष्मी का प्राकट्य
दिवाली का संबंध धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी के प्राकट्य से भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के उद्देश्य से समुद्र मंथन किया था। इस मंथन के दौरान कई दिव्य वस्तुएं और रत्न प्रकट हुए। इन्हीं में मां लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ था। मां लक्ष्मी को धन, वैभव, सुख और समृद्धि की देवी माना जाता है। मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या के दिन मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। यही वजह है कि दिवाली की रात घरों में दीप जलाकर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
3. भगवान श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का वध
दिवाली और छोटी दिवाली से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर से संबंधित है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर नामक शक्तिशाली असुर ने अपने अत्याचारों से देवताओं और आम लोगों का जीवन कठिन कर दिया था। उसने हजारों कन्याओं को बंदी बना रखा था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराया। इस विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि नरकासुर के अंत की खुशी में लोगों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था। इसी प्रसंग को नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली से भी जोड़कर देखा जाता है।
4. भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि को भेजा था पाताल लोक
दिवाली से जुड़ी एक मान्यता भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की कथा से भी संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा बलि अत्यंत शक्तिशाली होने के साथ-साथ बड़े दानवीर भी थे। उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। ऐसे में भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान वामन ने अपने विराट स्वरूप से दो पग में ही धरती और आकाश को नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु ने उनके सिर पर तीसरा पग रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया। इस कथा को भी दीपावली से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में शामिल किया जाता है।
5. भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है दिवाली
हिंदू धर्म के साथ-साथ जैन धर्म में भी दीपावली का विशेष धार्मिक महत्व है। जैन मान्यताओं के अनुसार, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या के दिन बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। उनके मोक्ष प्राप्त करने के बाद लोगों ने दीप जलाकर इस अवसर को याद किया। जैन समुदाय के लिए दिवाली केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि भगवान महावीर के निर्वाण और उनके बताए गए अहिंसा, सत्य तथा आत्मसंयम के मार्ग को याद करने का अवसर भी है। इस दिन जैन धर्म के अनुयायी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवान महावीर के उपदेशों का स्मरण करते हैं।
6. बंगाल समेत पूर्वी भारत में मां काली की पूजा का है विशेष महत्व
देश के पूर्वी हिस्सों, खासकर पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात मां काली की विशेष पूजा की जाती है। इसे काली पूजा के रूप में जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां काली ने राक्षसों का संहार करके संसार को उनके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। उन्हें शक्ति, साहस और बुराई के विनाश का प्रतीक माना जाता है। इसी मान्यता के चलते कार्तिक अमावस्या की रात मां काली की आराधना करने की परंपरा है। इस अवसर पर मंदिरों और घरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु मां काली से सुख, सुरक्षा और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। इस तरह भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दिवाली के पर्व को मनाने की परंपराएं भले ही अलग हों, लेकिन सभी मान्यताओं का मूल संदेश अच्छाई की जीत और जीवन में सकारात्मकता का स्वागत करना है।
दिवाली का पर्व देता है अंधकार पर प्रकाश की जीत का संदेश
दिवाली केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी, मां लक्ष्मी का प्राकट्य, भगवान श्रीकृष्ण की विजय और भगवान महावीर के निर्वाण जैसी अलग-अलग मान्यताएं इस त्योहार को विशेष बनाती हैं। देश के अलग-अलग राज्यों में इसे मनाने के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन हर परंपरा में प्रकाश, खुशहाली, सद्भाव और सकारात्मकता का संदेश छिपा है। यही कारण है कि दीपावली को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।


