Report by: Ajay Nigam
Bhopal: भोपाल के लाल परेड मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष की गतिविधियों के तहत रविवार को विशाल एकत्रीकरण आयोजित किया गया। कार्यक्रम में करीब 30 हजार स्वयंसेवकों के साथ समाज से लगभग 5 हजार मातृशक्ति और अन्य महानुभावों ने सहभागिता की। अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभाव से जुड़े इस आयोजन में संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए सामाजिक संपर्क और सेवा कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम में सामूहिक आसन, योग प्रदर्शन और घोष वादन प्रमुख आकर्षण रहे। स्वयंसेवकों के अनुशासित प्रदर्शन के माध्यम से स्वस्तिक और शताब्दी वर्ष के प्रतीक 100 सहित विभिन्न आकृतियां प्रस्तुत की गईं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में एम्स भोपाल के निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल मौजूद रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय और भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंच पर उपस्थित रहे।
Bhopal: सामूहिक योग और घोष प्रदर्शन ने खींचा ध्यान
आयोजन की शुरुआत स्वयंसेवकों द्वारा सामूहिक आसनों के प्रदर्शन से हुई। इसमें उत्कट आसन, अर्धकटी चक्रासन, अर्धचक्रासन सहित अलग-अलग योगासनों का प्रदर्शन किया गया। इसके बाद सामूहिक योगाभ्यास कराया गया, जिसमें सात प्रकार के योगाभ्यास प्रस्तुत किए गए।
योग प्रदर्शन के बाद संघ के घोष वादकों ने विभिन्न रचनाओं का वादन किया। घोष की प्रस्तुतियों के दौरान स्वयंसेवकों ने मैदान में स्वस्तिक और शताब्दी वर्ष के प्रतीक 100 समेत विभिन्न आकृतियां बनाईं। सामूहिक प्रदर्शन में अनुशासन और समन्वय पर विशेष ध्यान दिखाई दिया।
Bhopal: अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचना जरूरी: नरेंद्र कोतवाल
मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने कहा कि संघ की यात्रा व्यक्ति निर्माण से शुरू होकर परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण तक जाती है। उन्होंने ऐसे आयोजन में शामिल होने को अपने लिए गौरव का विषय बताया।
उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्र की ताकत केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से निर्धारित नहीं होती। नागरिकों का चरित्र, सामाजिक एकता, कर्तव्यबोध और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना भी राष्ट्र की शक्ति का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब विकास के अवसर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें और प्रत्येक नागरिक खुद को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सहभागी माने।
Bhopal: पंचपरिवर्तन के विषयों पर भी दिया जोर
डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने समाज के सामने रखे गए पंचपरिवर्तन के विषयों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सामाजिक समरसता, परिवार और संस्कार, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता तथा नागरिक कर्तव्य को समाज के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषय बताया।
उनके अनुसार इन विषयों पर सामूहिक प्रयास किए जाने से समाज के भीतर जिम्मेदारी, सहयोग और सकारात्मक परिवर्तन की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
Bhopal: भारत का आगे बढ़ना मानवता के लिए भी जरूरी: दत्तात्रेय होसबाले
मुख्य वक्ता दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसकी प्रगति विज्ञान, अंतरिक्ष समेत कई क्षेत्रों में दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि भारत का विकास केवल देश के लिए ही नहीं, बल्कि मानवता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भारत की उपलब्धियों को लेकर रुचि दिखाई दे रही है। भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों और विभिन्न क्षेत्रों में देश की प्रगति के साथ भारत को लेकर सम्मान और गौरव की भावना भी बढ़ी है।
होसबाले ने कहा कि संघ भारत के परम वैभव के उद्देश्य को लेकर काम कर रहा है। यह किसी एक उपलब्धि पर समाप्त होने वाली यात्रा नहीं है। व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
Bhopal: पांच हजार साल की सभ्यतागत यात्रा में जीवंत रहा भारत
सरकार्यवाह ने कहा कि भारत की लगभग पांच हजार वर्षों की सभ्यतागत यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव आए। देश ने अलग-अलग कालखंडों में आक्रमण, संघर्ष और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया, लेकिन उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनधारा बनी रही।
उन्होंने कहा कि दुनिया की कई ऐसी सभ्यताएं रही हैं जो किसी समय शक्तिशाली थीं, लेकिन आज उनके बारे में इतिहास या पुरातात्विक अवशेषों के माध्यम से जानकारी मिलती है। इसके विपरीत भारत आज भी एक जीवंत समाज और सभ्यता के रूप में मौजूद है।
उन्होंने भारत को अविनाशी और मृत्युंजय राष्ट्र के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि किसी समाज की शक्ति केवल इस बात से नहीं आंकी जाती कि उसके सामने कितनी समस्याएं आती हैं, बल्कि इससे होती है कि वह संकटों का सामना करने में कितना सक्षम है।
Bhopal: पराधीनता के दौरान समाज अपनी शक्ति को भूल गया था
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि लंबे समय तक चली पराधीनता के दौर में भारतीय समाज में अपने स्वरूप, सामर्थ्य और राष्ट्रीय दायित्व को लेकर विस्मृति आई। सामाजिक कुरीतियों, आपसी संघर्ष और राग-द्वेष ने भी समाज की एकता को प्रभावित किया।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने इस बात पर विचार किया कि जिस भारत ने कभी भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बनाया था, वह पराधीन कैसे हुआ।
उनके अनुसार समाज अपने राष्ट्रभाव और सामूहिक जिम्मेदारी को भूल गया था। इसी स्थिति को बदलने के लिए व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन को केंद्र में रखकर कार्य शुरू किया गया।
Bhopal: हनुमान-जामवंत के प्रसंग से समझाई सामर्थ्य की बात
होसबाले ने रामायण के हनुमान और जामवंत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार व्यक्ति के भीतर क्षमता होने के बावजूद उसे अपनी शक्ति का बोध नहीं रहता। सीता जी की खोज के दौरान समुद्र पार करने की चुनौती के समय वानर दल के सामने भी ऐसी ही स्थिति बनी थी।
उन्होंने बताया कि जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। शक्ति उनके भीतर पहले से मौजूद थी, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और जागृत करने की थी। इसके बाद हनुमान जी ने समुद्र पार किया।
होसबाले ने इस प्रसंग को समाज से जोड़ते हुए कहा कि समाज भी कई बार अपनी शक्ति को भूल जाता है। ऐसे समय में कोई विचार, संगठन या महापुरुष समाज को उसकी क्षमता का बोध कराने का काम करता है। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने भी समाज की अंतर्निहित शक्ति को जागृत करने के लिए संगठन निर्माण पर जोर दिया।
Bhopal: शाखा से व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन की प्रक्रिया
सरकार्यवाह ने कहा कि संघ की शाखा को केवल शारीरिक गतिविधियों के स्थान के रूप में नहीं देखना चाहिए। शाखा के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र निर्माण, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
उन्होंने कहा कि शाखा से समाज संगठन और समाज संगठन से राष्ट्र निर्माण की यात्रा जुड़ी हुई है। जब व्यक्ति अपने से आगे बढ़कर परिवार, समाज और राष्ट्र के बारे में विचार करता है, तभी सामूहिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती है।
हर नागरिक रोज सोचे कि राष्ट्र के लिए क्या कर सकता है
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को प्रतिदिन यह विचार करना चाहिए कि वह अपने गांव, मोहल्ले, कार्यस्थल और समाज के लिए क्या कर सकता है। राष्ट्र के प्रति दायित्व केवल किसी विशेष अवसर पर व्यक्त होने वाली भावना नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अपने काम को ईमानदारी से करना, जरूरतमंद की सहायता करना, समाज के लिए समय देना और आसपास के वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयास करना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति को केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित नहीं किया जा सकता। नागरिक के दैनिक व्यवहार और कार्यों में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव दिखाई देना चाहिए।
कोविड और बाढ़ के दौरान सेवा कार्यों का उल्लेख
होसबाले ने कोविड महामारी के दौरान समाज की सामूहिक शक्ति का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि संकट के उस दौर में स्वयंसेवकों और समाज के अलग-अलग वर्गों ने मिलकर अनेक सेवा गतिविधियां कीं।
उन्होंने असम में बाढ़ के दौरान सेवा भारती के माध्यम से किए गए राहत कार्यों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार संकट की स्थिति में समाज के विभिन्न वर्गों का एक साथ खड़ा होना सामाजिक शक्ति का उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि सेवा किसी एक संगठन की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। संकट के समय समाज के सभी सक्षम लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग के लिए आगे आना चाहिए।
पंचपरिवर्तन को सामाजिक बदलाव का आधार बताया
सरकार्यवाह ने कहा कि संघ की ओर से समाज के साथ संवाद और संपर्क के दौरान कई ऐसे विषय सामने आए हैं, जिन पर सामूहिक रूप से काम करने की जरूरत है। इसी संदर्भ में पंचपरिवर्तन की अवधारणा को सामने रखा गया है।
उन्होंने सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, स्वबोध, पर्यावरण संरक्षण और कुटुंब प्रबोधन को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र के आधार पर दूरी कम करना, नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना और परिवार को संस्कार का केंद्र बनाए रखना आवश्यक है।
गांव और बस्तियों के विकास में समाज की भी भूमिका
होसबाले ने कहा कि किसी गांव या बस्ती के विकास की जिम्मेदारी केवल शासन-प्रशासन की नहीं हो सकती। वहां रहने वाले लोगों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता या अन्य क्षेत्रों में यदि कोई कमी है तो समाज को अपनी क्षमता के अनुसार उसके समाधान में सहयोग करना चाहिए। सामूहिक जिम्मेदारी की भावना गांव और बस्तियों को मजबूत बनाने में मदद कर सकती है।
उन्होंने नई पीढ़ी को रामायण, महाभारत, संतों की वाणी और भारतीय परंपरा के अन्य स्रोतों से परिचित कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार इन परंपराओं में कर्तव्य, सेवा, त्याग और चरित्र निर्माण से जुड़े अनेक संदेश मौजूद हैं।
स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन पर जोर
दत्तात्रेय होसबाले ने शारीरिक स्वास्थ्य को भी समाज निर्माण से जोड़ा। उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन एक-दूसरे से जुड़े हैं। गांवों और कस्बों में व्यायाम की जो परंपरा रही है, उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
लाल परेड मैदान में हुए सामूहिक आसन और योग प्रदर्शन को भी इसी दृष्टि से देखा गया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखने के लिए नियमित अभ्यास करना चाहिए।
सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर संगठन पर जोर
सरकार्यवाह ने कहा कि जाति, पंथ, भाषा और प्रांत के आधार पर समाज में अलगाव की भावना उसकी सामूहिक शक्ति को कमजोर करती है। उन्होंने संगठन की शक्ति समझाने के लिए चार उंगलियों के एक साथ मिलकर मुट्ठी बनने का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की विविधता को समाप्त करना उद्देश्य नहीं है। अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और परंपराओं के बावजूद खुद को एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा मानना जरूरी है।
उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दृष्टि में समाज को जोड़ने और सभी के सुख-दुख में सहभागी बनने की भावना महत्वपूर्ण रही है।
प्रतिदिन समाज के लिए समय देने की अपील
होसबाले ने कहा कि समाज संगठन कोई एक दिन में पूरा होने वाला काम नहीं है। जिस तरह किसी खिलाड़ी को अपनी क्षमता बनाए रखने के लिए लगातार अभ्यास करना पड़ता है, उसी तरह समाज संगठन के लिए भी निरंतर प्रयास जरूरी है।
उन्होंने गांव, मोहल्ले और बस्ती के स्तर पर समाज के लिए प्रतिदिन कुछ समय देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि निस्वार्थ भाव से प्रतिदिन एक घंटा भी समाज को दिया जाए तो इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
शताब्दी वर्ष में व्यापक सामाजिक संपर्क का प्रतिवेदन
कार्यक्रम में विभाग कार्यवाह राधेश्याम मालवीय ने शताब्दी वर्ष के दौरान भोपाल विभाग में किए गए कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने और संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियां आयोजित की गईं।
प्रतिवेदन के अनुसार शताब्दी वर्ष के दौरान बस्तियों में आयोजित संचलनों में 35,400 स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। गृह संपर्क अभियान के जरिए 2,69,381 घरों तक पहुंच बनाई गई। इसके अलावा 248 बस्तियों और मंडलों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किए गए।
इन गतिविधियों के साथ प्रमुख जनगोष्ठियां, सामाजिक सद्भाव बैठकें, युवा संवाद, प्रतिभावान विद्यार्थी सम्मेलन और श्रम साधक सम्मेलन भी आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संपर्क, संवाद और सामाजिक सहभागिता को बढ़ाना बताया गया।
विद्यार्थियों के बीच भी हुआ संवाद
भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में लगभग 250 विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में दत्तात्रेय होसबाले ने विद्यार्थियों के सवालों का जवाब दिया। भारत माता की प्रतिमा पर पुष्पार्चन के बाद राम जन्मभूमि संघर्ष पर आधारित डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया।
विद्यार्थियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक, तकनीकी और राष्ट्रीय विषयों से जुड़े 11 प्रश्न रखे। संवाद के दौरान युवा पीढ़ी, शिक्षा, तकनीक, भ्रष्टाचार, सामाजिक समरसता, राष्ट्रबोध और नागरिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
युवाओं के सवालों को सुनने और संवाद बढ़ाने की बात
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि युवाओं का प्रश्न करना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद और नचिकेता के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रश्न पूछने वाले युवाओं के साथ संवाद किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी युवा को केवल उसके बाहरी स्वरूप या विचारों के आधार पर देखने के बजाय उसकी संवेदना और सकारात्मक क्षमता को समझने का प्रयास होना चाहिए। युवाओं के सवालों को सुनकर उनसे संवाद बढ़ाना जरूरी है।
मानसिक स्वतंत्रता और भारतीय दृष्टि पर चर्चा
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय दृष्टि, इतिहास और ज्ञान परंपरा के संदर्भ में अध्ययन की आवश्यकता बनी हुई है।
उन्होंने इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय दृष्टिकोण से शोध की आवश्यकता बताई। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय समाज की कमियों और उपलब्धियों दोनों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन किए जाने की बात कही।
तकनीक साधन रहे, मनुष्य उसका नियंत्रण बनाए रखे
डिजिटल युग में तकनीक के उपयोग से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि मूल विचार और मूल्य स्थायी रह सकते हैं, लेकिन समय के अनुसार नए साधनों का उपयोग किया जा सकता है।
उन्होंने सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करने की बात कही, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इन माध्यमों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह व्यक्ति के विवेक और संस्कार पर निर्भर करता है। उनके अनुसार तकनीक मानवता, राष्ट्र और पर्यावरण के लिए उपयोगी होनी चाहिए और उसका नियंत्रण मनुष्य के हाथ में रहना चाहिए।
भ्रष्टाचार से लड़ाई की शुरुआत स्वयं से करने की बात
भ्रष्टाचार से जुड़े प्रश्न पर सरकार्यवाह ने कहा कि व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन बदलाव की शुरुआत व्यक्ति के अपने आचरण से भी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वयं भ्रष्टाचार से दूर रहना और अपने आसपास इसके खिलाफ जागरूकता पैदा करना सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उन्होंने विद्यार्थियों और प्राध्यापकों से भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने की बात कही।
शिक्षित वर्ग की सामाजिक जिम्मेदारी अधिक
होसबाले ने कहा कि विद्यार्थी और प्राध्यापक समाज का शिक्षित वर्ग हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है। शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे समाज के प्रति दायित्व से भी जोड़ा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की शिक्षा में समाज का योगदान होता है, इसलिए शिक्षित व्यक्ति को भी अपनी क्षमता के अनुसार समाज के लिए योगदान देना चाहिए।
युवाओं से संवेदना को कार्य में बदलने की अपील
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें केवल यह विचार नहीं करना चाहिए कि समाज में क्या समस्याएं हैं, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि वे उन समस्याओं के समाधान में क्या योगदान कर सकते हैं।
उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की परंपरा में दूसरे समुदायों और संकटग्रस्त लोगों को आश्रय देने के उदाहरण मिलते हैं। उन्होंने इसे भारतीय समाज की व्यापक मानवीय दृष्टि से जोड़कर देखा।
शाखा से समाज संगठन और समाज संगठन से राष्ट्र निर्माण
भोपाल में हुए दोनों कार्यक्रमों में दत्तात्रेय होसबाले के संबोधन में व्यक्ति निर्माण, सामाजिक संगठन, सेवा, नागरिक दायित्व, युवाओं से संवाद और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय प्रमुख रहे।
लाल परेड मैदान के विराट एकत्रीकरण में जहां हजारों स्वयंसेवकों की सहभागिता और शताब्दी वर्ष के कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, वहीं छात्र संवाद में विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के सवालों के माध्यम से नई पीढ़ी के साथ संवाद पर जोर दिया गया।
होसबाले ने कहा कि राष्ट्र निर्माण किसी एक व्यक्ति या संस्था का काम नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपने दैनिक जीवन और अपने कार्यक्षेत्र से समाज और राष्ट्र के लिए योगदान कर सकता है। उनके संबोधन में शाखा से व्यक्ति निर्माण, व्यक्ति से समाज संगठन और समाज संगठन से राष्ट्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया को प्रमुखता से रेखांकित किया गया।
छात्र संवाद कार्यक्रम का समापन सामूहिक ‘वंदे मातरम्’ उद्घोष के साथ हुआ।
read also: Bhopal: श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे : दत्तात्रेय होसबाले


