Chakrapani Maharaj’s memorandum to the President: राम मंदिर ट्रस्ट की जांच और मूल हिंदू पक्षकारों को शामिल करने की उठाई मांग

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Chakrapani Maharaj's memorandum to the President

Chakrapani Maharaj’s memorandum to the President दशकों तक संघर्ष करने वाले मूल पक्षकारों की अनदेखी का आरोप, न्याय की गुहार

Chakrapani Maharaj’s memorandum to the President अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और श्रीराम जन्मभूमि कानूनी लड़ाई में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख अपीलकर्ता स्वामी चक्रपाणि महाराज ने देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि अयोध्या आंदोलन और कोर्ट के लंबे संघर्ष में हिंदू महासभा समेत देश के कई संतों और वकीलों ने दशकों तक अपनी जान और समय की आहुति दी। 15 अक्टूबर 2019 को मध्यस्थता समिति के सामने हुए समझौते के बाद ही मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ था। लेकिन, जब ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन किया गया, तो इन मूल हिंदू पक्षकारों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया, जो कि इस ऐतिहासिक लड़ाई के योद्धाओं के साथ सरासर नाइंसाफी है।

Chakrapani Maharaj’s memorandum to the President दान राशि और देव-द्रव्य में हेरफेर की आशंका; निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग

राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में स्वामी चक्रपाणि महाराज ने राम मंदिर को मिलने वाले चढ़ावे को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से मंदिर की दान राशि, भक्तों द्वारा अर्पित स्वर्ण, रजत (चांदी) और अन्य बहुमूल्य देव-द्रव्यों के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं और वित्तीय हेरफेर के आरोप सामने आ रहे हैं। चक्रपाणि महाराज के अनुसार, यदि इन आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह दुनिया भर के करोड़ों रामभक्तों की अगाध आस्था के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है। इसलिए इन सभी वित्तीय गतिविधियों की उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच होना बेहद जरूरी है।

Chakrapani Maharaj’s memorandum to the President राष्ट्रपति महोदया के समक्ष रखी गईं ये 3 प्रमुख मांगें:

स्वामी चक्रपाणि महाराज ने देश के संवैधानिक प्रधान से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील करते हुए निम्नलिखित बिंदु सामने रखे हैं:

  • पक्षकारों की सहभागिता: राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़ी किसी भी तरह की कथित गड़बड़ियों की जांच के लिए बनने वाली समिति में मूल हिंदू पक्षकारों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
  • ट्रस्ट का पुनर्गठन: वर्तमान ट्रस्ट की संरचना की नए सिरे से समीक्षा की जाए और मूल आंदोलनकारियों व पक्षकारों को इसमें सम्मानजनक प्रतिनिधित्व (स्थान) मिले।
  • अधिवक्ताओं का सम्मान: रामलला के पक्ष में वर्षों तक अदालत में मजबूत पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं और प्रतिनिधियों को भी ट्रस्ट के प्रबंधन में जगह देने पर विचार हो।

उन्होंने अंत में दोहराया कि श्रीराम मंदिर केवल एक ढांचा या धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह करोड़ों हिंदुओं के त्याग और बलिदान का प्रतीक है; अतः इसके संचालन में शत-प्रतिशत पारदर्शिता और जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

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