Supreme Court Judgment on Homemakers ‘होममेकर नहीं, नेशन बिल्डर कहें’: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सड़क हादसों में गृहिणियों के मुआवजे पर दिए बड़े निर्देश

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Supreme Court Judgment on Homemakers

Supreme Court Judgment on Homemakers देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने घरेलू महिलाओं (गृहिणियों) के हक में एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि परिवार और समाज के निर्माण में पत्नियों व माताओं का योगदान अमूल्य है, इसलिए उन्हें महज “होममेकर” (गृहिणी) नहीं, बल्कि नेशन बिल्डर” (राष्ट्र निर्माता) कहा जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने सड़क हादसों के मामलों में गृहिणियों की काल्पनिक आय (Notional Income) के आकलन को लेकर नए और कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं।

Supreme Court Judgment on Homemakers ऑफिस जाने वालों से कम नहीं गृहिणियों का श्रम: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि घर संभालने वाली महिलाओं का श्रम किसी भी तरह उस व्यक्ति से कम नहीं है जो दफ्तर जाकर पैसे कमाता है।

“एक गृहिणी की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि परिवार के किसी ऐसे सदस्य की जिसकी आमदनी स्थिर हो। यदि उनके द्वारा किए गए कार्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनका योगदान उच्च कोटि का और अमूल्य है।” – सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Judgment on Homemakers मोटर एक्सीडेंट क्लेम में ‘घरेलू देखभाल का नुकसान’ बनेगा आधार

Supreme Court Judgment on Homemakers सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि सड़क हादसों के मामलों में अदालतों या न्यायाधिकरणों द्वारा महिलाओं की काल्पनिक आय को एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम आंक दिया जाता है। पीठ ने निर्देश दिया है कि:

  • श्रम और बलिदान का सम्मान: हादसों के मामलों में गृहिणियों की काल्पनिक आय का आकलन उनके दैनिक कार्यों, समय, श्रम और त्याग के आधार पर होना चाहिए।
  • अतिरिक्त मुआवजा: घरेलू देखभाल और देखरेख के नुकसान को अब मोटर एक्सीडेंट क्लेम (Motor Accident Claim) में मुआवजा तय करने के लिए एक मजबूत और अतिरिक्त आधार माना जाएगा।

Supreme Court Judgment on Homemakers 20 साल पुराने मामले में बदला फैसला, मुआवजा बढ़ाकर किया ₹6 लाख

Supreme Court Judgment on Homemakers यह ऐतिहासिक फैसला साल 2006 में उत्तराखंड में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। वाहन का बीमा न होने के कारण पहले मुआवजा राशि महज 2.50 लाख रुपये तय की गई थी। हाईकोर्ट ने भी महिला की आय को बेहद कम मानते हुए इसे सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विसंगतियों को रेखांकित करते हुए कहा:

  1. मूल्यांकन में गलती: किसी गृहिणी की आय को दिहाड़ी मजदूर से कम आंकना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
  2. तथ्यात्मक त्रुटियां: निचली अदालतों की रिपोर्ट में वाहन का प्रकार गलत था, महिला की उम्र कम दिखाई गई थी और उनके नाबालिग बेटे को वयस्क बता दिया गया था।

सर्वोच्च अदालत ने इन सभी गलतियों को सुधारते हुए मुआवजे की राशि को ढाई लाख से बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दिया है और विपक्षी दल को छह सप्ताह के भीतर इस राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है।

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