BY
Yoganand Shrivastava
Holi भारत में होली के उत्सव को पूर्णता तब मिलती है जब हवा में अबीर-गुलाल के साथ भांग की ठंडाई की महक घुलती है। इसे केवल एक नशीले पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि ‘शिव के प्रसाद’ के रूप में देखा जाता है। वेदों में ‘विजय’ के नाम से पुकारी जाने वाली भांग को धरती के पांच सबसे पवित्र पौधों में गिना गया है। आखिर यह परंपरा कैसे शुरू हुई और इसके पीछे के वैज्ञानिक व कानूनी तथ्य क्या हैं?
पौराणिक जड़ें: शिव का प्रिय और अमृत की बूंदों का साथ
Holi भांग की उत्पत्ति को लेकर दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को पीने के बाद भगवान शिव के शरीर में उत्पन्न हुई भयंकर गर्मी को शांत करने के लिए उन्होंने भांग का सेवन किया था। दूसरी मान्यता यह है कि जब देवता अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तब उसकी कुछ बूंदें धरती पर गिरीं, जिनसे भांग के पौधे का जन्म हुआ। मध्यकाल में वसंत ऋतु के आगमन और बदलते मौसम के दौरान शरीर को शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से इसे होली के उल्लास से जोड़ दिया गया।

भारत में कानूनी स्थिति: क्या भांग पीना अपराध है?
Holi भारत में भांग की कानूनी स्थिति ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट, 1985’ के तहत परिभाषित है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ इस कानून के तहत भांग के पौधे के फूलों और राल (Resin) से बनने वाले गांजा और चरस पर पूरी तरह प्रतिबंध है, वहीं पौधे की पत्तियों के इस्तेमाल को छूट दी गई है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भांग की सरकारी दुकानें संचालित होती हैं। हालांकि, बिना लाइसेंस इसकी खेती करना आज भी दंडनीय अपराध है और अलग-अलग राज्यों में इसके नियम भिन्न हो सकते हैं।

सेवन के तरीके और स्वास्थ्य से जुड़ी सावधानियां
Holi भांग तैयार करना भी एक पारंपरिक कला है। इसकी पत्तियों को साफ करके, भिगोकर सिल-बट्टे पर बारीक पीसा जाता है, जिसे ‘भांग का गोला’ कहते हैं। होली पर इसे ठंडाई, पकौड़ों या बर्फी के रूप में लिया जाता है। आयुर्वेद में इसे सीमित मात्रा में औषधि माना गया है जो अनिद्रा और तनाव में सहायक है। हालांकि, इसका अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को इससे पूरी तरह दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि त्योहार का आनंद फीका न पड़े।
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