BY: Yoganand Shrivastva
Gwalior news:ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स (आरपीएसएफ) के एक आरक्षक की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि बिना कर्मचारी को पक्ष रखने का अवसर दिए सेवा से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र यादव की खंडपीठ ने आरक्षक महेंद्र सिंह की रिट अपील स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया।
मामले के अनुसार, महेंद्र सिंह की नियुक्ति वर्ष 1990 में आरपीएसएफ में आरक्षक के पद पर हुई थी। एक आपराधिक मामले में पुलिस हिरासत में लिए जाने के कारण वे निर्धारित समय पर ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो सके, जिसके बाद उन्हें निलंबित कर विभागीय जांच शुरू की गई।
जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में महेंद्र सिंह पर लगाए गए सभी आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया। इसके बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी ने न तो कोई नोटिस जारी किया और न ही सुनवाई का अवसर दिया, बल्कि सीधे सेवा से हटाने का आदेश पारित कर दिया।
इस आदेश के विरुद्ध महेंद्र सिंह ने विभागीय अपील और पुनरीक्षण याचिका दायर की, लेकिन दोनों ही स्तरों पर राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट की एकलपीठ में याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। अंततः मामला युगल पीठ के समक्ष रिट अपील के रूप में पहुंचा।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि अनुशासनिक प्राधिकारी जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमत होता है, तो कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। ऐसा न करना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर मामला दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित प्राधिकारी को भेज दिया।





