BY: Yoganand Shrivastva
Dehli news: वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर में दर्शन के समय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था में देवता को पर्याप्त विश्राम नहीं मिल पा रहा है, जो चिंताजनक है। उन्होंने यहां तक कहा कि यह स्थिति देवता के शोषण जैसी प्रतीत होती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि दोपहर में मंदिर बंद होने के बावजूद देवता को आराम का समय नहीं मिल पाता। सीजेआई ने यह सवाल भी उठाया कि विशेष पूजा की अनुमति उन्हीं लोगों को क्यों दी जाती है, जो अधिक धनराशि देने में सक्षम होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भगवान के विश्राम समय में पूजा कराना केवल पैसे के आधार पर कैसे उचित ठहराया जा सकता है।
क्यों पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट
यह मामला ठाकुर बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है। मंदिर की देखरेख करने वाले गोस्वामी समाज ने व्यवस्था में बदलाव को लेकर याचिका दायर की है। उनका कहना है कि मंदिर प्रबंधन के अधिकारों में बदलाव और दर्शन समय बढ़ाने से पारंपरिक नियमों का उल्लंघन हो रहा है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और मंदिर की हाई पावर्ड कमेटी को नोटिस जारी किया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी में होगी।
जीवंत स्वरूप मानकर होती है पूजा
बांके बिहारी जी को भगवान कृष्ण का बाल स्वरूप माना जाता है। यहां उनकी पूजा एक जीवंत स्वरूप की तरह की जाती है, जिसमें जागरण, श्रृंगार, भोग और विश्राम का विशेष महत्व है। गोस्वामी समाज के पुजारी मानते हैं कि जैसे एक बालक को आराम की जरूरत होती है, वैसे ही बांके बिहारी जी को भी निश्चित समय पर विश्राम दिया जाना चाहिए।
दर्शन समय बढ़ने पर आपत्ति
पहले मौसम के अनुसार मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने का एक तय समय था। गर्मी और सर्दी में दर्शन के घंटे अलग-अलग रखे जाते थे। लेकिन हाल ही में गठित समिति ने सुबह और शाम दोनों सत्रों में दर्शन का समय एक-एक घंटे बढ़ा दिया। यह व्यवस्था करीब दो महीने से लागू है।
गोस्वामी समाज का कहना है कि दर्शन का समय बढ़ाने से श्रद्धालुओं को तो सुविधा मिल रही है, लेकिन बाल स्वरूप कान्हा दर्शन देते-देते थक जाते हैं। इसी कारण उन्होंने पुराने नियमों को बहाल करने की मांग की है।सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद यह साफ है कि अब इस मामले में देवता के विश्राम और परंपराओं को केंद्र में रखकर फैसला किया जा सकता है।





