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भगवामय होने की राह पर बिहार: सीमांचल नई राजनीतिक जमीन, सामाजिक और आर्थिक असमानता पर बीजेपी-संघ की मजबूत होती पकड़

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बिहार की राजनीति इस बार एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ संकेत दिया है कि राज्य की राजनीतिक धारा तेज़ी से बदल रही है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसका मुख्य केंद्र बनकर उभर रही है। एनडीए को इस चुनाव में कुल 202 सीटों का भारी जनादेश मिला है। इनमें से 89 सीटें BJP और 85 सीटें JDU के खाते में गईं। वहीं विपक्षी महागठबंधन महज़ 35 सीटें जीतकर सिमट गया। 2020 में 75 सीटें जीतने वाली आरजेडी (RJD) इस बार सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को भी राज्य की जनता ने निराशाजनक प्रदर्शन के साथ केवल 6 सीटें दीं।

BJP की बढ़त और संघ की जमीन पर पकड़

इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि BJP ने न सिर्फ सीटों में बढ़त बनाई है, बल्कि वोट शेयर के मामले में भी वह शीर्ष पर पहुंचने की कगार पर है। इस बार पार्टी को 20.08% वोट मिले, जो उसे राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित करता है। पहले नंबर पर 23% वोट शेयर के साथ RJD, जबकि तीसरे स्थान पर 19.25% वोट के साथ JDU रही है। दिलचस्प बात यह है कि BJP ने 2020 के मुकाबले अपने वोट प्रतिशत में वृद्धि दर्ज की है। 2020 में उसका वोट शेयर 19.46% था, जो 2025 में बढ़कर 20.08% हो गया। यह बढ़ोतरी बताती है कि पार्टी ने न सिर्फ अपने पारंपरिक वोटर्स को साधा है, बल्कि नए वर्ग को भी अपने साथ जोड़ने में सफल रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासोन्मुखी योजनाओं के साथ इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सक्रियता 2020 की तुलना में अधिक दिखाई दी। बूथ स्तर पर संघ के कार्यकर्ताओं की जमीनी मेहनत और संगठनात्मक तैयारी ने BJP को अतिरिक्त बढ़त दिलाई। संघ ने कई संवेदनशील इलाकों में सामाजिक अभियानों और समन्वय बैठकों के ज़रिए अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया, जिसका लाभ सीधे-सीधे चुनाव परिणामों में देखने को मिला।

सीमांचल: नई राजनीतिक जमीन

बिहार का सीमांचल क्षेत्र किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया पारंपरिक रूप से एक अलग ही राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। यहां जातीय और धार्मिक समीकरण राजनीतिक दलों की रणनीति का आधार रहे हैं, लेकिन इस बार सीमांचल को लेकर BJP और संघ दोनों ने स्पष्ट रणनीति बनाई। यही वजह है कि सीमांचल अब नई राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में उभर रहा है, जहां विपक्ष के बजाय सत्तापक्ष ने मजबूत पैठ बनाई है।

यह क्षेत्र जनसांख्यिकी के लिहाज़ से भी हमेशा चर्चा में रहता है। संघ ने पिछले कुछ वर्षों में सीमांचल में “जनसंख्या असंतुलन” से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया और इसे मुख्यधारा की राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाया। अब यह मुद्दा बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता हुआ दिखाई दे रहा है।

जनसांख्यिकी का मुद्दा: चुनावी बहस का केंद्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा उठाया गया जनसांख्यिकी में अपेक्षित बदलाव का मुद्दा अब केवल सामाजिक विमर्श नहीं, बल्कि चुनावी गणनाओं का प्रमुख हिस्सा बन चुका है। BJP ने इस मुद्दे को नियंत्रित और संयमित तरीके से जनता के सामने रखा और इसे विकास, सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन से जोड़ा। इसका असर वोटिंग पैटर्न में साफ दिखाई देता है, विशेषकर उन जिलों में जहां पिछले वर्षों में जनसंख्या संरचना तेजी से बदली है। RSS की यह रणनीति BJP के लिए ‘न्यू पॉलिटिकल कन्सॉलिडेशन’ साबित हुई है। इसी वजह से बिहार तेजी से भगवामय होने की राह पर दिख रहा है, जहां हिंदुत्व आधारित राजनीति और विकास-प्रधान नेतृत्व का कॉम्बिनेशन जनता को आकर्षित करता दिख रहा है।

बिहार के 2025 के चुनाव नतीजे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं। BJP का उभार, JDU की स्थिरता, RJD का लगातार गिरता ग्राफ और कांग्रेस की कमजोर होती पकड़, ये सभी मिलकर बिहार के नए राजनीतिक समीकरण गढ़ रहे हैं। सीमांचल जैसे क्षेत्र अब सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई का केंद्र बनते जा रहे हैं।

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