BY: Yoganand Shrivastva
नई दिल्ली। 1 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए। विजयादशमी के दिन 1925 में नागपुर से शुरू हुआ यह संगठन आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने इसे इस उद्देश्य से शुरू किया था कि भारतीय समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाया जा सके और सनातन संस्कृति की जड़ों को मजबूत किया जा सके।
बीते सौ सालों में संघ ने समाज, शिक्षा, संस्कृति, राजनीति और सेवा के कई क्षेत्र में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष तौर पर यह संगठन कांग्रेस जितना सक्रिय नहीं रहा, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन जैसे मौकों पर स्वयंसेवकों ने स्थानीय स्तर पर भागीदारी की। आज़ादी के बाद संघ ने समाज सुधार और सेवा कार्यों पर ज्यादा ध्यान दिया। जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए “एक मंदिर – एक कुआं – एक श्मशान” जैसी योजनाएं शुरू कीं और बाढ़, भूकंप, चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे पहले राहत पहुंचाने के लिए जाना गया।
1952 में विद्या भारती की स्थापना हुई, जो आज भारत का सबसे बड़ा शैक्षिक संगठन बन चुका है। इसके हजारों स्कूलों में लाखों बच्चे पढ़ते हैं और यहां उन्हें शिक्षा के साथ संस्कृति, योग, नैतिकता और राष्ट्रभक्ति के मूल्य सिखाए जाते हैं। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में ग्राम विकास योजनाएं चलाकर भारतीय जीवन मूल्यों को बचाने की कोशिश की गई।
राजनीति पर भी संघ का असर गहरा रहा। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की नींव रखी, जो बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। आज भाजपा भारत की सबसे बड़ी पार्टी है और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक कई प्रधानमंत्री संघ की पृष्ठभूमि से आए। यही नहीं, 1960 के दशक से संघ ने विदेशों में भी शाखाएं शुरू कीं और अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका व एशिया के देशों में भारतीय प्रवासी समाज को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।
हालांकि इसके सफर पर विवाद भी रहे। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, हालांकि जांच में वह निर्दोष साबित हुआ। आलोचकों ने इसे हमेशा हिंदुत्ववादी संगठन कहा और धार्मिक ध्रुवीकरण के आरोप लगाए, लेकिन संघ ने संविधान और कानून के पालन पर जोर दिया और अपनी गतिविधियों को जारी रखा।
समय के साथ RSS से जुड़कर कई संगठन बने, जिन्हें “संघ परिवार” कहा जाता है। इनमें भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और सेवा भारती जैसे संगठन शामिल हैं, जिन्होंने मजदूरों, किसानों, छात्रों और समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ा।
आज की स्थिति देखें तो देशभर में RSS की रोज़ाना 60,000 से अधिक शाखाएं लगती हैं। लाखों स्वयंसेवक शिक्षा, समाज सेवा, राजनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। नागपुर मुख्यालय से शुरू हुआ यह संगठन आज वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहा है और संकट की घड़ी में सबसे पहले सेवा पहुंचाने वाला संगठन माना जाता है।
सौ साल पूरे होने पर RSS की उपलब्धियां गिनें तो यह भारत का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसने शिक्षा और ग्रामीण विकास में हजारों प्रकल्प चलाए, राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई और भारतीय प्रवासी समाज को जोड़कर वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
निष्कर्ष यही है कि एक सदी की यात्रा में RSS केवल एक संगठन नहीं रहा बल्कि एक विचारधारा और जीवनशैली बन चुका है। आलोचनाओं और विवादों के बावजूद सेवा, संस्कार और संगठन की ताकत से इसने भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी है और आज जब यह शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है, तब इसका असर पहले से कहीं ज्यादा व्यापक दिखाई देता है।





