कैंसर का इलाज बेहद जटिल और महंगा होता है। नई रिसर्च ने एक अहम तथ्य उजागर किया है, धूम्रपान न केवल कैंसर होने का खतरा बढ़ाता है, बल्कि इसका इलाज भी कम असरदार बना देता है।
एम्स दिल्ली (AIIMS), कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी और फ्रांस की अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) की संयुक्त स्टडी में सामने आया है कि स्मोकिंग करने वाले मरीजों में:
- इलाज का असर धीमा पड़ता है।
- दवाओं की खुराक ज्यादा देनी पड़ती है।
- मरीजों की जीवित रहने की दर (Survival Rate) कम हो जाती है।
क्यों जरूरी है स्मोकिंग हिस्ट्री रिकॉर्ड करना?
रिसर्चर्स ने जोर दिया है कि कैंसर मरीजों की स्मोकिंग हिस्ट्री दर्ज करना अब विकल्प नहीं, बल्कि इलाज का जरूरी हिस्सा होना चाहिए।
- स्मोकिंग डेटा से डॉक्टर सही इलाज तय कर पाएंगे।
- दवा की खुराक का निर्धारण आसान होगा।
- रिसर्च और मेडिकल टेस्ट के नतीजे ज्यादा सटीक मिलेंगे।
रिसर्च में क्या-क्या सामने आया?
- स्मोकिंग करने वाले मरीजों को दवा एर्लोटिनिब (Erlotinib) की दोगुनी खुराक देनी पड़ी।
- सामान्य मरीजों को 150 mg प्रतिदिन दी जाती है।
- स्मोकिंग करने वालों को 300 mg तक की डोज की आवश्यकता पड़ी।
- तंबाकू या सिगरेट का सेवन जारी रखने पर इलाज लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह पाता।
- स्मोकिंग डेटा दर्ज करने से टेस्टिंग प्रक्रिया और परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ती है।
एक्सपर्ट्स की राय
एम्स दिल्ली के डॉ. अभिषेक शंकर और उनकी टीम ने कहा कि:
- धूम्रपान की जानकारी मेडिकल डिसीजन को प्रभावित कर सकती है।
- तंबाकू सेवन को रोकने की पहल कैंसर रिसर्च प्रोटोकॉल में शामिल करनी चाहिए।
- इससे इलाज की सफलता दर और मरीजों की जीवित रहने की संभावना दोनों बढ़ सकती हैं।
यह स्टडी साफ बताती है कि कैंसर के इलाज में स्मोकिंग हिस्ट्री दर्ज करना बेहद जरूरी है। अगर मरीज धूम्रपान करता है, तो डॉक्टर उसी हिसाब से दवाओं की खुराक और इलाज की रणनीति तय करेंगे।
इस रिसर्च के अनुसार, भविष्य में कैंसर का हर इलाज तभी सफल होगा, जब मरीज की स्मोकिंग हिस्ट्री को ध्यान में रखकर इलाज किया जाए।





