संसद में वंदे मातरम पर चर्चा: सदन में तकरार क्यों? इतिहास से लेकर राजनीतिक विवाद तक पूरी कहानी

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by: vijay nandan

दिल्ली: संसद के विशेष सत्र में ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने पर शुरू हुई बहस ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी पार्टियों, खासकर कांग्रेस, के बीच तीखी राजनीतिक नोकझोंक देखने को मिल रही है। सरकार का कहना है कि यह चर्चा राष्ट्रीय गीत के अनदेखे पहलुओं को सामने लाने के लिए है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा करार दे रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा से LIVE

संसद में 10 घंटे की बहस की तैयारी

लोकसभा में आज ‘वंदे मातरम’ पर करीब 10 घंटे लंबी चर्चा प्रस्तावित है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल होंगे। मंगलवार को राज्यसभा में भी इसी विषय पर विस्तृत बहस निर्धारित है, जहां गृह मंत्री अमित शाह अपनी बात रखेंगे।

1870 के दशक में रचा गया यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का प्रतीक बन चुका है, लेकिन समय-समय पर इस पर राजनीतिक मतभेद भी उभरते रहे हैं। इस बार भी अलग-अलग दलों की राय बंटी हुई नजर आई—TMC ने बहस का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस ने इसका विरोध किया है।

कांग्रेस का आरोप, बहस का मकसद मुद्दों से ध्यान हटाना

कांग्रेस ने कहा कि सरकार चुनावी सुधारों और ‘SIR’ जैसे अहम मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस चर्चा को सामने ला रही है। उनके अनुसार, 150 साल पुराने गीत को अचानक राजनीतिक वाद-विवाद का केंद्र बनाना एक सोची-समझी रणनीति है।

पीएम मोदी का कांग्रेस पर हमला, 1937 का फैसला फिर चर्चा में

प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को 1937 के उस ऐतिहासिक निर्णय पर घेरा, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के कुछ छंदों को अलग रखा गया था। मोदी के अनुसार यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्र की आवाज बना, हर भारतीय की भावनाओं को इससे प्रेरणा मिली, लेकिन 1937 में इसके महत्वपूर्ण हिस्सों को हटा दिया गया। इससे ‘विभाजनकारी सोच’ को बल मिला। पीएम मोदी ने कहा कि आज की पीढ़ी को जानना चाहिए कि ऐसा निर्णय क्यों लिया गया था, और यह देश की एकता के लिए कैसी चुनौती साबित हुआ। कांग्रेस की सफाई, नेहरू, गांधी, बोस समेत शीर्ष नेताओं का सामूहिक निर्णय था। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए प्रधानमंत्री के आरोपों को खारिज कर दिया। पार्टी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि
1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद, राजेंद्र प्रसाद और सरोजिनी नायडू जैसे प्रमुख नेताओं की सहमति से निर्णय लिया गया था कि ‘वंदे मातरम’ की केवल शुरुआती दो पंक्तियाँ ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाई जाएँ।

बाकी छंदों में धार्मिक भावनाओं का स्वर अधिक था, जिससे मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने आपत्ति जताई थी। इसलिए सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया।

  • तो विवाद क्यों?
  • 150 साल पुराने गीत के नए सिरे से राजनीतिक केंद्र बन जाने की वजह है—
  • इसके इतिहास की अलग-अलग व्याख्याएँ
  • इसे लेकर दलों के अपने-अपने दावे
  • स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका
  • और वर्तमान राजनीतिक संदेश
  • यही वजह है कि ‘वंदे मातरम’ फिर एक बार संसद से लेकर राजनीति तक चर्चा का सबसे गर्म विषय बन गया है।

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