BY: Vijay Nandan
दुबई में भारत ने चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर इतिहास रच दिया। इस जीत से पूरा देश जश्न में डूब गया। हर गली-मोहल्ले में आतिशबाजी, जयकारों और मिठाइयों का दौर चल रहा था। लेकिन इस जश्न के बीच कुछ जगहों से सांप्रदायिक हिंसा की खबरें भी सामने आईं। इंदौर जिले के मऊ क्षेत्र में भी क्रिकेट प्रेमियों ने इस ऐतिहासिक जीत का उत्सव मनाया। लोग सड़कों पर उतरकर तिरंगा लहराते हुए ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मना रहे थे। हालांकि, इस दौरान कुछ अप्रिय घटनाएं भी सामने आईं। जश्न मना रहे लोगों पर कुछ असामाजिक तत्वों ने पत्थरबाजी की, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। पुलिस ने तत्परता से कार्रवाई करते हुए स्थिति को नियंत्रण में लिया और शांति बहाल की। कुछ अन्य शहरों में कुछ समुदायों के बीच टकराव हो गया। बताया जा रहा है कि जब एक समुदाय के लोग जीत का जश्न मना रहे थे, तभी दूसरे समुदाय के कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और पत्थरबाजी शुरू हो गई। देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
गुजरात के अहमदाबाद के खोखरा इलाके में भी भारत की जीत का जश्न मना रहे लोगों पर पत्थरबाजी हुई। अनुपम क्रॉसरोड्स के पास दो गुटों के बीच झड़प हो गई, जिसमें कम से कम दो लोग घायल हो गए। पुलिस ने स्थिति संभालते हुए सात लोगों को हिरासत में लिया।
तेलंगाना के हैदराबाद में चैंपियंस ट्रॉफी 2025 में भारत की जीत के जश्न के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ताओं पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज की घटना सामने आई है। यह घटना तब हुई जब भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर विजय उत्सव मना रहे थे। पुलिस का कहना है कि सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई आवश्यक थी, जबकि भाजपा नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।
खुशी के माहौल में हिंसा क्यों?
भारत एक धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता से भरा हुआ देश है। यहां त्योहार, क्रिकेट की जीत या राष्ट्रीय उपलब्धियां सबके लिए गर्व की बात होती हैं। लेकिन जब ऐसी ऐतिहासिक जीत के अवसर पर भी सांप्रदायिक तनाव देखने को मिले, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। सवाल उठता है कि आखिर कुछ लोग इस बदलते भारत के नए राष्ट्रवाद को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? क्यों हर छोटी-बड़ी बात पर समाज को धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश की जाती है?
नया राष्ट्रवाद: खेल से परे सोचने की जरूरत
आज का भारत एक नए राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है, जहां धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर देश के विकास, गर्व और गौरव की बात होनी चाहिए। क्रिकेट, ओलंपिक्स या अन्य खेलों में भारत की जीत पूरे देश की जीत होती है, न कि किसी एक समुदाय की। ऐसे में सवाल यह है कि कुछ लोग इस भावना को स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे?
1. धार्मिक संकीर्णता:
कुछ कट्टरपंथी विचारधाराओं के कारण लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि राष्ट्र किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं होता, बल्कि यह सभी का है। खेल की जीत को भी सांप्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा है, जो बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।
2. राजनीतिक ध्रुवीकरण:
कई बार राजनीतिक दल भी इस तरह की घटनाओं को हवा देते हैं ताकि ध्रुवीकरण हो और इसका लाभ चुनावों में उठाया जा सके। ऐसी मानसिकता समाज को कमजोर करती है और राष्ट्रवाद को केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित कर देती है।
3. सामाजिक असहिष्णुता:
भारत में असहिष्णुता की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लोग अपने विचार, धर्म और पहचान को दूसरों से ऊपर मानते हैं और यह मानने को तैयार नहीं होते कि एक सांझा भारतीय पहचान भी हो सकती है।
समाधान क्या हो सकता है?
अगर भारत को सच्चे अर्थों में एक मजबूत राष्ट्र बनाना है, तो हमें इस संकीर्ण सोच से बाहर निकलना होगा। इसके लिए:
- शिक्षा और जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय एकता और साझा संस्कृति की शिक्षा दी जानी चाहिए। लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि जीत किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे देश की होती है।
- सख्त कानून और कार्रवाई: ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों।
- सकारात्मक राष्ट्रवाद को बढ़ावा: मीडिया, सोशल मीडिया और सिनेमा को समावेशी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहिए, न कि विभाजनकारी विचारों को।
- चैंपियंस ट्रॉफी की जीत भारत के लिए गौरव का क्षण था, लेकिन इसे सांप्रदायिक हिंसा से दूषित कर दिया गया। यह दिखाता है कि भारत में राष्ट्रवाद की परिभाषा को अब भी समझने की जरूरत है। हमें इस संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलकर एक सच्चे राष्ट्रवादी बनना होगा, जो भारत को सिर्फ धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और खेल उपलब्धियों के आधार पर देखे। यही नए भारत की पहचान होगी।





