रीवा का वह नेता जिसने प्रधानमंत्री से टकराने में भी संकोच नहीं किया, जाति से ऊपर उठकर राजनीति की और सिद्धांतों पर समझौता कभी नहीं किया – वह थे पंडित श्रीनिवास तिवारी।
रीवा की धरती को दो चीज़ों के लिए जाना जाता है — सफेद बाघ मोहन और सफेद शेर पंडित श्रीनिवास तिवारी। एक ऐसा नाम जो अब भी लोगों की जुबान पर सम्मान से लिया जाता है — दादा, दैव, और रीवा का सफेद शेर।
नेतृत्व की असली पहचान: जाति नहीं, जनसेवा
- श्रीनिवास तिवारी ने कभी किसी की जाति नहीं पूछी।
- उनके दरबार में हर वर्ग और समाज का व्यक्ति समान रूप से सुना जाता था।
- वे कहते थे – “जो गलत है, वो गलत है। बात खत्म।”
शुरुआत: 17 सितंबर 1926 को शाहपुर में जन्म
- जन्म: शाहपुर (ननिहाल), गृह ग्राम: नी, जिला रीवा
- पढ़ाई: वकालत की शिक्षा पूरी की
- राजनीति में शुरुआत: छात्र जीवन से ही सक्रिय
- स्वतंत्रता संग्राम में भी भागीदारी की
समाजवाद और संघर्ष: 22 वर्ष की उम्र में समाजवादी पार्टी बनाई
- गरीबों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ शुरू की लड़ाई
- 1952 में पहली बार विधायक बने — मनगवां विधानसभा, रीवा
- परिवार गरीब था, चुनाव लड़ने के लिए भी पैसे नहीं थे
- गांव के कामता प्रसाद तिवारी ने गहने गिरवी रख 500 रुपये दिए
नेतृत्व की ऊंचाई: जब मध्यप्रदेश की राजनीति बदली
- कांग्रेस में शामिल हुए 1973 में — इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘दादा’ कहा
- 1980: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री बने
- 1990: विधानसभा उपाध्यक्ष बने
- 1993: विधानसभा अध्यक्ष बने (दिग्विजय सिंह सरकार में)
अटल बिहारी वाजपेयी से भी टकराव: एक ऐतिहासिक किस्सा
- 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी रीवा आए
- मंच से कहा: “रीवा में सफेद शेर रहता है, पर सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क, पता नहीं चलता”
- अगली बार वाजपेयी के रीवा दौरे पर श्रीनिवास समर्थकों ने हंगामा किया
- हालात बिगड़ने पर कलेक्टर ने विमान उतरने की अनुमति नहीं दी
सिद्धांतों पर अडिग: पद छोड़ना मंज़ूर, समझौता नहीं
- कांग्रेस सरकार में रहते हुए अपनी ही पार्टी के खिलाफ आवाज़ उठाई
- मंत्री पद को भी छोड़ा जब बात सिद्धांतों पर आ गई
- अर्जुन सिंह से मतभेद तो रहे, पर मनभेद कभी नहीं हुआ
- उनकी ईमानदारी और निर्णय क्षमता आज भी मिसाल है
दादा की अंतिम विदाई: 19 जनवरी 2018
- श्रीनिवास तिवारी के निधन से विंध्य क्षेत्र में शोक की लहर
- उनके पुत्र सुंदरलाल तिवारी ने विरासत को आगे बढ़ाया
- 2019 में सुंदरलाल तिवारी भी दुनिया छोड़ गए
- अब जिम्मेदारी उनके पोते सिद्धार्थ तिवारी राज के पास है
राजनीतिक बदलाव: कांग्रेस से बीजेपी तक की यात्रा
- 2023 में टिकट न मिलने पर सिद्धार्थ तिवारी ने कांग्रेस छोड़ भाजपा जॉइन की
- कांग्रेसियों ने तंज कसते हुए कहा – “सफेद शेर के कुनबे में सियार आ गया”
- पर आज सिद्धार्थ तिवारी राज त्योंथर से विधायक हैं
श्रीनिवास तिवारी जैसे नेता क्यों नहीं बनते आज?
विपक्ष के विधायक अभय मिश्रा भी मानते हैं –
“श्रीनिवास तिवारी जैसे नेता बनाए नहीं जाते, पैदा होते हैं।”
आज की राजनीति में विचारों की जगह धनबल और बाहुबल ने ले ली है। शराब, मुर्गा, और नोटों के सहारे चुनाव जीतने वाले नेता जनसेवा नहीं, सत्ता भोग की राजनीति कर रहे हैं।
आपका क्या मानना है?
राजनीति आज कैसा चेहरा ले चुकी है? क्या दादा जैसे नेता फिर पैदा हो सकते हैं?
कमेंट सेक्शन में हमें बताएं कि आपके अनुसार एक सच्चे नेता में कौन-कौन से गुण होने चाहिए।
नमन उस शेर को, जिसकी दहाड़ अब भी गूंजती है
“दादा, तेरा नाम रहेगा – पूरा चांद रहेगा।”
शब्द भले शांत हो गए हों, पर श्रीनिवास तिवारी की राजनीति में जो गूंज थी, वह आज भी देश और मध्यप्रदेश की राजनीति में मिसाल है।





