BY: Yoganand Shrivastava
मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसमें ज़िलाधिकारी संजीव श्रीवास्तव परीक्षा के दौरान एक छात्र को कई बार थप्पड़ मारते हुए कैमरे में कैद हुए। 1 अप्रैल को बीएससी द्वितीय वर्ष की गणित परीक्षा के दौरान यह घटना दीनदयाल डंगरौलिया महाविद्यालय में घटित हुई। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।
क्या है मामला?
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कलेक्टर एक छात्र को परीक्षा कक्ष से उठाकर दूसरे कमरे में ले जाते हैं और उसे कई बार थप्पड़ मारते हैं। पीड़ित छात्र की पहचान रोहित राठौर के रूप में हुई है। छात्र का आरोप है कि पिटाई से उसके कान पर असर पड़ा है। वहीं, कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि कॉलेज में संगठित रूप से नकल हो रही थी और वे उसी की जांच करने पहुंचे थे। उन्होंने दावा किया कि कुछ छात्र प्रश्नपत्र बाहर ले जाकर हल करवा रहे थे।
कानूनी दृष्टिकोण
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराएं लागू हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं:
- धारा 323: जानबूझकर किसी को शारीरिक चोट पहुँचाना, जिसकी सजा एक वर्ष तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकती है।
- धारा 341: किसी को जबरन रोकना या उसकी स्वतंत्रता में बाधा डालना।
- धारा 504: अपमानजनक व्यवहार जिससे शांति भंग हो सकती है।
- धारा 506: आपराधिक धमकी देना।
क्या अधिकारी कानून से ऊपर है?
संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी सेवकों को सेवा से हटाए जाने की प्रक्रिया में सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे आपराधिक मामलों में भी छूट के पात्र हैं। कानून की नजर में हर नागरिक समान है – चाहे वह आम हो या अधिकारी।
मानवाधिकार का उल्लंघन
किसी छात्र को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और शारीरिक हिंसा करना उनके मौलिक अधिकारों – विशेषकर अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) – का सीधा उल्लंघन है। ऐसी घटनाएं मानवाधिकार आयोग के दायरे में आती हैं और स्वतः संज्ञान लिया जा सकता है।
प्रशासनिक और नैतिक समीक्षा
किसी वरिष्ठ अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह धैर्य और विवेक के साथ निर्णय ले। एक परीक्षा केंद्र में छात्र के साथ ऐसा व्यवहार न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह अन्य अधिकारियों के लिए भी एक नकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है। अगर नकल की शिकायत थी, तो उसके लिए निम्न कानूनी उपाय उपलब्ध थे:
- विश्वविद्यालय या बोर्ड को सूचित कर कार्रवाई की मांग करना
- नकल करते पकड़े गए छात्रों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराना
- पुलिस की सहायता लेना
लेकिन छात्र को सार्वजनिक रूप से पीटना, कानून की आत्मा के विरुद्ध है।
पहले से विवादों में घिरे कलेक्टर
यह पहली बार नहीं है जब कलेक्टर श्रीवास्तव विवादों में आए हों। हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने उनके आचरण पर गंभीर टिप्पणी की थी। साथ ही भिंड की तहसीलदार माला शर्मा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उनके और एसडीएम पर मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
निष्कर्ष
यह घटना न केवल प्रशासनिक शक्ति के दुरुपयोग का प्रतीक है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या कानून केवल आम जनता के लिए ही है?
- इस मामले में निष्पक्ष जांच करवाई जानी चाहिए।
- पीड़ित छात्र की चिकित्सा और मानसिक स्थिति की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
- अगर प्रथम दृष्टया अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो उन पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई जरूरी है।
लोकतंत्र और न्याय की वास्तविक शक्ति तभी सिद्ध होगी जब कानून हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू हो — चाहे वह छात्र हो या एक जिलाधिकारी।





