by: vijay nandan
भारत द्वारा सिंधु जल संधि को निलंबित करने के फैसले के बाद, पाकिस्तान ने चार पत्र भेजकर इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की है। इनमें से तीन पत्र ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भेजे गए थे।
भारत का निर्णय: संधि का निलंबन
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मृत्यु के बाद, भारत ने 23 अप्रैल को सिंधु जल संधि को निलंबित करने की घोषणा की। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पष्ट किया कि यह निलंबन तब तक जारी रहेगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करना बंद नहीं करता।

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: पत्रों के माध्यम से अपील
पाकिस्तान के जल संसाधन सचिव सैयद अली मुर्तजा ने भारत के जल शक्ति मंत्रालय को चार पत्र भेजे, जिनमें संधि के निलंबन पर पुनर्विचार करने की अपील की गई। इनमें से तीन पत्र ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भेजे गए थे।
जल संकट की आशंका
संधि के निलंबन से पाकिस्तान में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है, क्योंकि देश की सिंचाई आवश्यकताओं का लगभग 80% हिस्सा सिंधु प्रणाली की पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—से पूरा होता है। पाकिस्तान ने विश्व बैंक से भी हस्तक्षेप की अपील की, लेकिन उसे कोई सहायता नहीं मिली।
भारत का रुख: कोई बदलाव नहीं
भारत ने पाकिस्तान के पत्रों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है और अपने निर्णय पर अडिग है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने 29 अप्रैल को कहा कि भारत तब तक पाकिस्तान से बातचीत नहीं करेगा जब तक वह “विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से” सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करना बंद नहीं करता।
संधि का इतिहास
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी, जिसमें भारत को पूर्वी नदियों—ब्यास, रावी और सतलुज—का नियंत्रण मिला, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकार दिया गया। यह संधि अब तक चार युद्धों के बावजूद बनी रही थी, लेकिन पहली बार इसे निलंबित किया गया है।
भारत के इस निर्णय से पाकिस्तान में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है, और उसने चार पत्रों के माध्यम से संधि को बहाल करने की अपील की है। हालांकि, भारत अपने निर्णय पर कायम है और पाकिस्तान से आतंकवाद के समर्थन को समाप्त करने की मांग कर रहा है।





