रिपोर्ट – सुमित कुमार मेहरा
Raisen : फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी पर्दे पर जितनी भावुक थी, हकीकत में मूक-बधिर गीता की जिंदगी उससे कहीं अधिक संघर्षपूर्ण रही है। 11 साल की उम्र में गलती से रेल के जरिए पाकिस्तान के लाहौर पहुंचने वाली गीता, आज रायसेन जिले के दीवानगंज पहुंचीं। पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज के अथक प्रयासों से वतन वापसी करने वाली गीता अब अपनी जिंदगी की नई इबारत लिखने की तैयारी में हैं।
स्वदेश वापसी से शिक्षा के सफर तक: विदिशा में देंगी 10वीं की परीक्षा
Raisen वर्ष 2015 में पाकिस्तान के ईधी फाउंडेशन से भारत लाई गई गीता वर्तमान में अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। वे महाराष्ट्र के परभणी से विदिशा जिले के गुलाबगंज में कक्षा दसवीं की बोर्ड परीक्षा देने जा रही हैं। इस यात्रा के दौरान वे दीवानगंज में रुकीं, जहाँ उनके साथ आनंद सर्विस सोसाइटी के संचालक ज्ञानेंद्र पुरोहित भी मौजूद रहे। गीता ने इशारों में अपनी इच्छा जाहिर करते हुए बताया कि वे पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहती हैं ताकि अपने गरीब परिवार का सहारा बन सकें।
सुषमा स्वराज के निधन के बाद थमा मदद का हाथ: सर्टिफिकेट के लिए भटक रही गीता
Raisen गीता को भारत लाने में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ‘मदर इंडिया’ की भूमिका निभाई थी। उन्होंने न केवल गीता को वापस लाया, बल्कि उनके परिवार को खोजने में भी पूरी ताकत झोंक दी थी। हालांकि, उनके निधन के बाद गीता को सरकारी स्तर पर मिलने वाली मदद कम हो गई है। विडंबना यह है कि स्वदेश लौटे सालों बीत गए, लेकिन अब तक गीता का ‘दिव्यांग प्रमाणपत्र’ (Disability Certificate) नहीं बन सका है, जिसके कारण उन्हें किसी भी सरकारी योजना या आर्थिक सहायता का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
समाजसेवियों का सहारा और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद
Raisen सरकारी उपेक्षा के बावजूद, समाज के कुछ जागरूक लोग गीता की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। पंडित दिनेशानंद महाराज उनकी पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं, वहीं दीवानगंज के पूरन पटेल जैसे समाजसेवी समय-समय पर उनकी सहायता करते हैं। 2021 में डीएनए टेस्ट के जरिए महाराष्ट्र में अपने असली परिवार से मिलने के बाद, अब गीता का एकमात्र लक्ष्य स्वावलंबी बनना है। स्थानीय लोगों की मांग है कि सरकार जल्द से जल्द गीता का दिव्यांग सर्टिफिकेट बनवाए ताकि उनकी आगे की राह आसान हो सके।
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