AI के दौर में भीड़ जुटा रहे हैं लाइव इवेंट्स, निखिल कामत ने बताया क्यों

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निखिल कामत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से बदलती दुनिया में जहां हर चीज डिजिटल होती जा रही है, वहीं ज़ेरोधा के को-फाउंडर निखिल कामत ने मनोरंजन को लेकर एक बिल्कुल अलग नजरिया पेश किया है।

उनका मानना है कि भविष्य सिर्फ हाई-फाई, बड़े बजट की फिल्मों में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में है जो लोग मिलकर, लाइव और भावनात्मक रूप से महसूस करते हैं—जैसे कि कॉन्सर्ट्स, लोकल शो और सांस्कृतिक आयोजन।


“बिरयानी बनाम मिचेलिन रेस्टोरेंट” वाली तुलना ने सबका ध्यान खींचा

कामत ने अपने X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में लिखा:

“क्वालिटी सब्जेक्टिव है। इंटेलिजेंस शायद ये जानना है कि क्या काम कर सकता है। मैं तो 100 में से 99 बार एक अच्छे लोकल बिरयानी वाले को मिचेलिन-स्टार रेस्टोरेंट पर चुनूंगा।”

वो आगे लिखते हैं कि लाइव इवेंट्स में निवेश करना एक “कॉन्ट्रेरियन बेट” (भीड़ से अलग सोच) हो सकता है—खासकर उस दौर में जब AI ने डिजिटल अनुभवों को ठंडा और अप्राकृतिक बना दिया है।


डेटा भी यही कहता है: दर्शकों की पसंद बदल रही है

कामत ने कुछ आंकड़े साझा किए जो भारतीय दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं को दिखाते हैं:

  • 2018 में थिएटर दर्शकों की संख्या थी 945 मिलियन, लेकिन 2024 तक ये गिरकर 883 मिलियन रह गई, वो भी बड़े बजट की फिल्मों के बावजूद।
  • वहीं लाइव इवेंट्स का ग्राफ दोगुना हो गया है — 2018 में 8,000 से बढ़कर 2025 में 16,700 से ज्यादा हो गए।
  • सबसे तेज़ ग्रोथ छोटे फॉर्मैट वाले शो (2,000 दर्शकों से कम) में देखने को मिली है।

दर्शक अब चाहते हैं भागीदारी, न कि सिर्फ देखना

इस बदलाव का मतलब सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि एक गहरी संस्कृतिक शिफ्ट है। लोग अब उन इवेंट्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं जहां वो सिर्फ दर्शक नहीं, प्रतिभागी भी बन सकें।


मसाला फिल्में बना रहीं हैं बड़ी कमाई, बजट नहीं कहानी मायने रखती है

कामत का कहना है कि 2024 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्में वो थीं जिनका बजट ₹100 करोड़ से कम था। ये फिल्में इमोशनल, ड्रामेटिक और एस्केपिस्ट (भागने का माध्यम) थीं—जैसा कि भारतीय दर्शक हमेशा से पसंद करते आए हैं।

“इंटेलेक्चुअल रियलिज्म” की जगह “भावनात्मक कनेक्शन”

इन फिल्मों की सफलता ये साबित करती है कि दर्शक अब भी ऐसी कहानियों को पसंद करते हैं जो उन्हें भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं—न कि ज़रूरी रूप से रियलिस्टिक या ओवर-प्रोड्यूस्ड हों।


साउथ इंडियन सिनेमा और एनीमे से भी मिली प्रेरणा

कामत ने उदाहरण दिया कि कैसे:

  • साउथ की फिल्में, जैसे RRR, कांतारा, या मलयालम सिनेमा, संस्कृति, इमोशन और कहानी को बिना झिझक प्रस्तुत करते हैं।
  • जापानी एनीमे, जो अपनी ओवर-द-टॉप स्टोरीटेलिंग के कारण एक ग्लोबल फेनोमेना बन चुका है, उसमें भी इमोशनल कनेक्ट ही सबसे बड़ी ताकत है।
  • आज पश्चिमी शो जैसे Stranger Things भी इसी फॉर्मूला से प्रेरणा ले रहे हैं।

कामत का संदेश: “पागलपन को कम मत करो, उसे और बढ़ाओ”

कामत की बात साफ है—अगर भारत को मनोरंजन के नए युग में खुद को स्थापित करना है, तो उसे अपनी संस्कृति, इमोशन और पागलपन को दबाना नहीं, बल्कि उसे अपनाना और बढ़ाना होगा।


निष्कर्ष: लाइव इवेंट्स हैं भविष्य की कुंजी

बड़े बजट के बजाय, “छोटा लेकिन गहराई से जुड़ा अनुभव” अब मनोरंजन की नई परिभाषा बन रहा है। निखिल कामत की ये सोच सिर्फ बिजनेस के लिए नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सामूहिकता को एक नई पहचान देने की ओर भी इशारा करती है।

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