BY: Yoganand Shrivastva
एक आम लड़के से ‘मालिक’ बनने की कहानी
‘मालिक’ एक ऐसे युवक की कहानी है, जो सामाजिक अन्याय और निजी आक्रोश से जूझते-जूझते धीरे-धीरे सत्ता के दलदल में उतरता चला जाता है। प्रयागराज की गलियों से शुरू हुआ यह सफर न तो सीधा अपराध की राह पकड़ता है, न ही उसे कोई मसीहा बनाता है – यही फिल्म की खास बात है।
राजकुमार राव: अभिनय की रीढ़
फिल्म का केंद्रीय किरदार ‘दीपक’ पूरी तरह राजकुमार राव के कंधों पर टिका है, और उन्होंने इसे पूरे समर्पण के साथ निभाया है। उनके चेहरे के भाव, भीतर पल रहा क्रोध और बदलती मानसिकता बारीकी से उभरती है। ‘शाहिद’, ‘सिटीलाइट्स’ और ‘ओमेर्टा’ जैसी फिल्मों की तरह यहां भी कैमरा लगातार उन्हें पकड़ता है – और वे हर फ्रेम में जमे रहते हैं।
शुरुआत मजबूत, लेकिन फिल्म खुद से लड़ने लगती है
फिल्म की ओपनिंग एक गहरे और रियलिस्टिक गैंगस्टर ड्रामा का वादा करती है। प्रयागराज की असल गलियों, दमदार कैमरा वर्क और टोन सेटअप से लगता है कि कुछ असाधारण आने वाला है। मगर इंटरवल के बाद स्क्रिप्ट सतही हो जाती है। मेकर्स शायद गंभीरता से डर गए और कहानी को मसालेदार मोड़ पर ले आए।
सहायक भूमिकाएं: उम्मीद से कम
मानुषी छिल्लर की स्क्रीन प्रेजेंस कम है और उनका अभिनय भी खास प्रभाव नहीं छोड़ता। प्रोसेनजीत चटर्जी और सौरभ शुक्ला जैसे मंझे हुए कलाकारों को सीमित और पहले देखे जा चुके किरदारों में रखा गया है। हालांकि अंशुमान पुष्कर का प्रदर्शन सराहनीय है – उन्होंने अपने हिस्से को गहराई और ईमानदारी से निभाया है।
हुमा कुरैशी का गेस्ट अपीयरेंस
फिल्म में हुमा कुरैशी एक आइटम सॉन्ग में नजर आती हैं। उनकी एंट्री केवल दृश्य सजाने के लिए है, किरदार या कहानी से कोई खास जुड़ाव नहीं है। ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ में राजकुमार के साथ उनकी केमिस्ट्री जैसी बात यहां नहीं दिखाई देती।
निर्देशन की तारीफ, स्क्रिप्ट की कमी
निर्देशक पुलकित ने इलाहाबाद के सामाजिक तानेबाने और किरदारों की जद्दोजहद को अच्छे से दिखाया है। कैमरे का उपयोग, लोकेशन की विश्वसनीयता और रंगों की समझ काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन स्क्रिप्ट में कहीं नयापन की कमी खलती है – जिसे और बेहतर किया जा सकता था।





