Report: Rashid
Lucknow उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पुराने इलाकों में सोमवार को रूहानी और क्रांतिकारी माहौल देखने को मिला। आयतुल्लाह अली खामेनेई की स्मृति में आयोजित ‘शहादत दिवस’ के अवसर पर एक विशाल जुलूस निकाला गया। ‘स्वदेश न्यूज़’ के संवाददाता ने इस प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों और धर्मगुरुओं से खास बातचीत की, जहाँ धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ वैश्विक नीतियों के खिलाफ कड़ा आक्रोश भी नजर आया।
अमेरिका-इजराइल के खिलाफ विरोध और पुतला दहन
Lucknow छोटा इमामबाड़ा से शुरू होकर बड़ा इमामबाड़ा तक पहुंचे इस जुलूस में प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इजराइल मुर्दाबाद’ के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। आक्रोश इतना अधिक था कि भीड़ ने प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पुतले भी फूंके। सुरक्षा के मद्देनजर पूरे मार्ग को छावनी में तब्दील कर दिया गया था।
मौलानाओं का ‘स्वदेश न्यूज़’ को बयान: “विचारधारा कभी नहीं मरती”
Lucknow जुलूस में शामिल प्रमुख मौलानाओं ने ‘स्वदेश न्यूज़’ से विशेष बातचीत में कहा कि यह आयोजन केवल एक शोक सभा नहीं, बल्कि जुल्म के खिलाफ एक आवाज है। धार्मिक नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा, “यदि किसी को यह गलतफहमी है कि आयतुल्लाह खामेनेई जैसे व्यक्तित्व को मिटाकर उनकी विचारधारा खत्म की जा सकती है, तो वे गलत हैं। वह आज भी दुनिया भर के लाखों मजलूमों के दिलों में जिंदा हैं।” उलेमाओं ने खामेनेई को फिलिस्तीन और लेबनान जैसे उत्पीड़ित राष्ट्रों की बुलंद आवाज बताया।
सांप्रदायिक सौहार्द और ऐतिहासिक जड़ों का संगम
Lucknow इस विशाल जुलूस की सबसे बड़ी विशेषता शिया और सुन्नी समुदायों की एकजुटता रही। लाखों की संख्या में शामिल महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं ने इसे ‘इस्लामी एकता’ का प्रतीक बताया। गौरतलब है कि इस आंदोलन की जड़ें उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव से भी जुड़ी हैं, जहाँ आयतुल्लाह खुमैनी के पूर्वजों का जन्म हुआ था। इसी आध्यात्मिक विरासत और 1979 की इस्लामी क्रांति की प्रेरणा ने आज लखनऊ की सड़कों पर न्यायपूर्ण शांति और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को एक नई ऊर्जा दी।
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