हाल ही में Hauterrfly के साथ बातचीत में जाह्नवी कपूर ने पुरुषों की उस सोच पर तंज कसा, जो महिलाओं के पीरियड्स के दर्द को मजाक में उड़ाते हैं। उन्होंने कहा, “अगर मैं अपनी बात रख रही हूँ या बहस कर रही हूँ और आप कहते हैं, ‘क्या तुम्हें पीरियड्स चल रहे हैं?’ तो ये बिल्कुल गलत है।” लेकिन उन्होंने ये भी साफ किया कि अगर कोई पुरुष सच्ची हमदर्दी दिखाता है और पूछता है, “क्या तुम ठीक हो? क्या तुम्हें थोड़ा आराम चाहिए?” तो ये स्वागत योग्य है।
जाह्नवी कपूर ने पुरुषों को आड़े हाथ लेते हुए कहा, “पुरुष इस दर्द और मूड स्विंग्स को एक मिनट भी नहीं झेल पाएंगे। अगर पुरुषों को पीरियड्स होते, तो न जाने क्या हंगामा मच जाता!” उनका ये तीखा लेकिन सटीक बयान एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है—पीरियड्स का दर्द कोई छोटी बात नहीं है, और इसे हल्के में लेना बंद होना चाहिए।
क्यों है ये मुद्दा अहम?
आइए इसे समझते हैं। शोध बताते हैं कि 80% से ज्यादा महिलाएं पीरियड्स के दौरान दर्द से गुजरती हैं, और कई बार ये दर्द इतना तेज होता है कि रोजमर्रा का काम करना मुश्किल हो जाता है। हार्मोनल बदलावों की वजह से शारीरिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव भी होते हैं। फिर भी, कितनी बार हमने सुना है कि महिलाओं के इस दर्द को “बस मूड स्विंग्स” कहकर टाल दिया जाता है? जाह्नवी कपूर का बयान एक झटका है—न सिर्फ पुरुषों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए, कि महिलाओं की सेहत को गंभीरता से लिया जाए।
ये सिर्फ पीरियड्स की बात नहीं है; ये सम्मान की बात है। जब जाह्नवी कपूर “उस तंज भरी नजर और लहजे” की बात करती हैं, तो वो एक गहरी समस्या की ओर इशारा कर रही हैं—महिलाओं की आवाज को दबाने या कमतर दिखाने की आदत। अपने बयान से वो न सिर्फ पुरुषों को, बल्कि पूरे समाज को जागरूक कर रही हैं कि अब वक्त है बदलाव का।
जाह्नवी कपूर: एक सितारे से बढ़कर
जाह्नवी कपूर को हम उनकी शानदार एक्टिंग के लिए जानते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने दिखाया कि वो सिर्फ स्क्रीन की स्टार नहीं, बल्कि समाज में बदलाव की आवाज भी हैं। ऐसे समय में, जब बॉलीवुड में गंभीर मुद्दों पर बात करने से लोग कतराते हैं, जाह्नवी कपूर का पीरियड्स जैसे निजी लेकिन सार्वभौमिक मुद्दे पर खुलकर बोलना काबिल-ए-तारीफ है।

काम की बात करें, तो जाह्नवी कपूर जल्द ही राम चरण के साथ पैन-इंडिया फिल्म पेड्डी में नजर आएंगी। इस फिल्म में शिव राजकुमार, जगपति बाबू और दिव्यendu शर्मा भी हैं, और इसे डायरेक्ट किया है बuchi बabu सना ने। एआर रहमान का म्यूजिक और दमदार कहानी इस फिल्म को पहले से ही चर्चा में ला चुकी है। लेकिन इस वक्त, जाह्नवी कपूर का असली जादू स्क्रीन से बाहर चल रहा है।
बड़ा सवाल: हमें क्या करना चाहिए?
जाह्नवी कपूर का बयान सिर्फ पुरुषों को लताड़ने के लिए नहीं है; ये समाज की सोच को चुनौती देता है। भारत में, जहां आज भी कई जगहों पर पीरियड्स को टैबू माना जाता है, उनके शब्दों का वजन और भी बढ़ जाता है। ये हमें याद दिलाता है कि बदलाव की शुरुआत खुली बातचीत से होती है। स्कूलों, दफ्तरों और घरों में पीरियड्स पर बात को सामान्य करना होगा, ताकि महिलाओं को शर्मिंदगी या ताने न झेलने पड़ें।
तो हम क्या कर सकते हैं? सबसे पहले, सुनें। अगर कोई महिला कहती है कि उसे दर्द है, तो उस पर यकीन करें। अगर वो परेशान है, तो उसे सपोर्ट करें, न कि जज करें। और अगर आप पुरुष हैं, तो थोड़ा वक्त निकालकर समझें कि हर महीने महिलाएं किस दौर से गुजरती हैं—ये कोई “मूड स्विंग्स” नहीं, बल्कि एक असली, कई बार असहनीय अनुभव है।
आखिरी बात
जाह्नवी कपूर ने न सिर्फ सुर्खियां बटोरीं, बल्कि एक ऐसी बातचीत शुरू की है, जिसे हमें आगे बढ़ाना है। पीरियड्स के दर्द को हल्के में लेने की सोच को तोड़ने और सहानुभूति बढ़ाने में उनका ये कदम अहम है। तो आइए, इस बहस को आगे ले जाएं—इसके बारे में बात करें, इसे शेयर करें, और सुनिश्चित करें कि कोई भी महिला अपने शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया के लिए कमतर महसूस न करे।
आपको जाह्नवी कपूर का ये बयान कैसा लगा? क्या आपने या आपके आसपास किसी ने ऐसी स्थिति का सामना किया है? नीचे अपनी राय शेयर करें, और इस बातचीत को जारी रखें। तब तक, जिज्ञासु बने रहें, संवेदनशील बने रहें, और एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां हर किसी की तकलीफ को सुना और समझा जाए।




