राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के बाद बड़ा एजेंडा तय, लेकिन आगे की राह में कई कूटनीतिक पेच !

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by: vijay nandan

नई दिल्ली: भारत और रूस के रिश्तों ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में सुर्खियाँ बटोरी हैं। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के बाद जारी हुआ 70 बिंदुओं वाला संयुक्त बयान बताता है कि दोनों देश अब आर्थिक, ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और कामगारों की आवाजाही जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊँचाइयों तक ले जाना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है, कि क्या महत्वाकांक्षा ही पर्याप्त है? इन लक्ष्यों को धरातल पर उतारने में कौन-सी वास्तविक चुनौतियाँ सामने आएंगी? और इस साझेदारी को लेकर पश्चिम, विशेषकर अमेरिका, क्या सोच रहा है?

आर्थिक एजेंडा: संभावनाएँ बड़ी, बाधाएँ उससे भी बड़ी

संयुक्त बयान में व्यापार को सबसे ऊपर रखा गया है। लक्ष्य है कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुँचाया जाए। वर्तमान में यह 68.7 अरब डॉलर है।

  • मुख्य फोकस क्षेत्र
  • भारत से रूस को निर्यात बढ़ाना
  • व्यापार में टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना
  • महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग
  • रुपये–रूबल में व्यापार
  • skilled workforce mobilization
  • विदेश सचिव विक्रम मिस्री के मुताबिक, आज की अस्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में यह साझेदारी “मजबूत संकेत” देती है। लेकिन विशेषज्ञों की राय थोड़ी सावधान करती है। रूस से आने वाला सस्ता तेल भारत–रूस व्यापार का बड़ा हिस्सा है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसकी निरंतरता जोखिम में है। बैंक और शिपिंग कंपनियाँ प्रतिबंधों के डर से पीछे हट रही हैं। ऐसे में तेल आयात का भविष्य अनिश्चित है। भारत–रूस FTA (जिसमें यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन शामिल होगी) इस निर्भरता को कम करने का एक रास्ता माना जा रहा है।

रक्षा सहयोग: पुराने सौदे अटके, नई दिशा की तलाश
रक्षा क्षेत्र भारत–रूस संबंधों की नींव रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में चुनौतियाँ बढ़ी हैं।
S-400 मिसाइल सिस्टम की डिलीवरी में देरी
परमाणु पनडुब्बी की डिलीवरी 2028 तक टली
नए सौदों पर स्पष्टता नहीं, हालाँकि भारत का झुकाव अब सिर्फ “खरीद” से हटकर संयुक्त उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण पर है। रूस भी इसे समझ रहा है।

अमेरिका की नज़र: असहजता, उत्सुकता और रणनीतिक चिंताएँ

हालाँकि अमेरिकी प्रशासन ने कोई सख्त प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन विश्लेषकों के बयान बताते हैं कि वाशिंगटन हल्का असहज जरूर है। पुतिन की दिल्ली यात्रा ऐसे समय हुई, जब अमेरिका–रूस संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं। जब भारत अमेरिकी गठजोड़ों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और जब दुनिया दो नए पावर ब्लॉक्स में बँटी नज़र आ रही है
कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों ने भारत–रूस निकटता का श्रेय ट्रंप प्रशासन की गलत नीतियों को दिया, जिसने भारत को “दूर धकेला”।

रणनीतिक कारक: रूस भारत के लिए क्यों ज़रूरी है?

भारत रूस को सिर्फ एक सैन्य आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं देखता।
महत्वपूर्ण कारण हैं, रूस, चीन के बढ़ते दबदबे को संतुलित करने में मदद करता है
भारत को कूटनीतिक स्वतंत्रता देता है ऊर्जा, परमाणु तकनीक और रक्षा में वर्षों की साझेदारी

पश्चिमी दबाव के बीच स्थिर संबंध

रूस का भारत आना इस बात का संकेत है कि मॉस्को अभी भी दिल्ली को एशिया की शक्ति-संतुलन राजनीति में अहम मानता है।

सामने आने वाली बड़ी चुनौतियाँ

  • अमेरिकी प्रतिबंध और तेल व्यापार की अस्थिरता
  • रक्षा सौदों में देरी और तकनीकी निर्भरता
  • रुपये–रूबल व्यापार का सीमित ढाँचा
  • FTA को वास्तविक रूप देना
  • रूस–चीन बढ़ती निकटता
  • यूरोप–अमेरिका की भू-राजनीतिक चिंताएँ
  • भारत–रूस संबंधों के भविष्य का रास्ता इन जटिल पहलों से होकर ही निकलेगा।

राष्ट्रपति पुतिन की यात्रा ने यह साफ़ किया कि भारत और रूस दोनों भविष्य में आर्थिक एकजुटता बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इन योजनाओं को साकार करने के लिए कूटनीतिक चतुराई, रणनीतिक संतुलन और वैश्विक दबावों से निपटने की क्षमता—तीनों की जरूरत होगी। भारत की चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका, रूस और यूरोप—तीनों के साथ संतुलन बनाते हुए अपने हित आगे बढ़ाए।

ये भी पढ़िए: 1991 से आज तक भारत-रूस की दोस्ती: पुतिन की भारत यात्रा के रणनीतिक मायने

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