H-1B : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने H-1B नॉन-इमिग्रेंट वीजा कार्यक्रम पर निगरानी और जांच को और सख्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को H-1B कार्यक्रम की अखंडता और अलग-अलग अमेरिकी सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने से जुड़ा एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी किया। इसके साथ ही कुछ H-1B आवेदनों पर लागू 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था को अगले 12 महीनों के लिए जारी रखने का फैसला भी किया गया है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि कुछ एम्प्लॉयर्स, थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट एजेंसियां और आउटसोर्सिंग कंपनियां H-1B व्यवस्था का कथित तौर पर इस तरह इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को रखने की स्थिति बन रही है। नए आदेश में ऐसे मामलों की ज्यादा बारीकी से जांच और सरकारी एजेंसियों के बीच सूचनाओं के बेहतर आदान-प्रदान का प्रावधान किया गया है।
इस पूरे बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका में मंजूर होने वाले H-1B मामलों में भारत से जन्मे लाभार्थियों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। USCIS की FY2024 रिपोर्ट में भारत से जन्मे लाभार्थियों की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत थी, जबकि चीन करीब 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था। FY2025 के आंकड़ों में भी भारत सबसे बड़ा लाभार्थी देश बना हुआ है।
H-1B प्रोग्राम को लेकर ट्रंप प्रशासन ने क्या कहा
व्हाइट हाउस के मुताबिक H-1B वीजा व्यवस्था मूल रूप से अमेरिका की अर्थव्यवस्था में विशेष कौशल और विशेषज्ञता वाले विदेशी कर्मचारियों को अस्थायी रूप से शामिल करने के लिए बनाई गई थी। लेकिन प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों और आउटसोर्सिंग फर्मों ने इसका इस्तेमाल ऐसे कर्मचारियों को लाने के लिए किया जो अमेरिकी श्रमिकों की जगह कम लागत पर काम कर सकें।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और रोजगार के अवसरों पर दबाव पड़ सकता है। नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में इसी वजह से H-1B आवेदनों की जांच प्रक्रिया में कई सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने पर जोर दिया गया है।
H-1B : अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी पर भी होगी नजर
नए आदेश में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि H-1B वीजा के लिए आवेदन करने वाले नियोक्ताओं के हालिया या प्रस्तावित कर्मचारियों की छंटनी के रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा जाएगा।
आदेश के अनुसार, विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को H-1B से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करते समय यह देखना होगा कि संबंधित नियोक्ता ने पिछले एक साल में समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना बना रहा है।
इसके अलावा अमेरिकी श्रम विभाग को पहले जमा किए गए Labor Condition Applications के आंकड़ों की समीक्षा शुरू करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किन कंपनियों के खिलाफ H-1B नियमों के उल्लंघन को लेकर आगे कार्रवाई की जरूरत हो सकती है।
H-1B : वेतन में अंतर को लेकर क्या है अमेरिकी प्रशासन का दावा
व्हाइट हाउस ने H-1B व्यवस्था को लेकर दावा किया है कि कुछ उद्योगों में H-1B कर्मचारियों को समान काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन मिलता है। एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में इस कथित वेतन अंतर को करीब 9,000 डॉलर से लेकर 20,000 डॉलर तक बताया गया है।
प्रशासन का तर्क है कि यदि H-1B कार्यक्रम के जरिए कम लागत वाले कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे घरेलू श्रम बाजार में वेतन पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि ये आंकड़े और उनके आधार प्रशासन के दावों का हिस्सा हैं, जिन्हें इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
H-1B : लाखों अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी का भी जिक्र
आदेश में टेक्नोलॉजी सेक्टर में हुई छंटनी को भी H-1B बहस से जोड़ा गया है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि 2022 से 2026 के बीच बड़ी संख्या में अमेरिकी टेक कर्मचारियों की नौकरियां गईं, जबकि इसी दौरान कंपनियों की ओर से H-1B कर्मचारियों की मांग बनी रही।
प्रशासन ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ मामलों में नौकरी गंवाने वाले अमेरिकी कर्मचारियों से ही उनकी जगह नियुक्त किए जाने वाले विदेशी कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिलवाया गया। ऐसे उदाहरणों को प्रशासन H-1B व्यवस्था के कथित दुरुपयोग के सबूत के तौर पर पेश कर रहा है।
नए आदेश का उद्देश्य ऐसे मामलों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना है कि H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों को हटाकर कम लागत वाले श्रम को लाने के लिए न हो।
H-1B : 1 लाख डॉलर की फीस पर भी बड़ा अपडेट
H-1B को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था की है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह व्यवस्था नए 18 सितंबर 2026 के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से पहली बार लागू नहीं हुई है। यह भुगतान 2025 में जारी की गई राष्ट्रपति की Proclamation के तहत शुरू किया गया था और 18 सितंबर 2026 की नई Proclamation के जरिए इसे अगले 12 महीनों के लिए बढ़ाया गया है।
नई Proclamation के अनुसार, 21 सितंबर 2026 से कुछ ऐसे H-1B आवेदकों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक रहेगी, जिनकी याचिका के साथ 1 लाख डॉलर का भुगतान नहीं किया गया है। इसमें कुछ राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में अपवाद का प्रावधान भी रखा गया है।
इसका मतलब यह है कि 1 लाख डॉलर की रकम को हर H-1B धारक की सामान्य सालाना फीस समझना सही नहीं होगा। मौजूदा Proclamation इसे खास परिस्थितियों में H-1B याचिका के साथ जुड़े भुगतान के रूप में लागू करती है।
H-1B फीस को एक साल के लिए बढ़ाया गया
व्हाइट हाउस ने कहा है कि 2025 में शुरू किए गए 1 लाख डॉलर के भुगतान और H-1B चयन प्रक्रिया में किए गए बदलावों का उद्देश्य कम वेतन और कम कौशल वाली नियुक्तियों को हतोत्साहित करना है।
नई Proclamation के मुताबिक यह प्रतिबंध 21 सितंबर 2026 से प्रभावी होगा और फिलहाल 12 महीने तक लागू रहेगा। इस अवधि के दौरान प्रशासन फिर से इसकी समीक्षा करेगा और आगे इसे बढ़ाने या बदलने को लेकर सिफारिश की जा सकती है।
व्हाइट हाउस का दावा है कि 2025 के बदलावों के बाद बड़े IT आउटसोर्सिंग समूहों की H-1B रजिस्ट्रेशन संख्या में भारी गिरावट आई है। प्रशासन ने इसे अपनी नीति के प्रभाव के तौर पर पेश किया है।
H-1B वीजा में भारत की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा
भारतीय पेशेवरों के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि H-1B कार्यक्रम में भारत लंबे समय से सबसे बड़ा लाभार्थी देश रहा है।
USCIS की FY2024 रिपोर्ट के अनुसार, मंजूर H-1B याचिकाओं में 71 प्रतिशत लाभार्थी भारत में जन्मे थे। चीन करीब 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था। FY2025 के आंकड़ों में भी भारत सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाला देश रहा और लगभग 70 प्रतिशत लाभार्थी भारत में जन्मे थे।
यही वजह है कि H-1B नियमों में होने वाले बदलावों का प्रभाव भारतीय IT प्रोफेशनल्स, इंजीनियर्स, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे कुशल कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
H-1B : किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है H-1B
H-1B वीजा मुख्य रूप से ऐसे विशेष पेशेवरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनकी नौकरियों के लिए विशिष्ट तकनीकी या विशेषज्ञता वाले कौशल की जरूरत होती है। इनमें टेक्नोलॉजी, कंप्यूटर से जुड़े काम, इंजीनियरिंग, रिसर्च, शिक्षा और दूसरे विशेष पेशे शामिल हैं।
USCIS के आंकड़ों के मुताबिक कंप्यूटर से जुड़े व्यवसाय H-1B स्वीकृतियों का सबसे बड़ा हिस्सा रखते हैं। इसलिए अमेरिकी IT कंपनियों के साथ-साथ भारतीय IT सर्विस कंपनियों और उनके कर्मचारियों के लिए इस कार्यक्रम में होने वाले बदलाव महत्वपूर्ण हैं।
H-1B : हर साल कितने H-1B वीजा मिलते हैं
मौजूदा नियमों के तहत सामान्य H-1B कैप 65,000 वीजा का है। इसके अलावा अमेरिकी संस्थानों से एडवांस्ड डिग्री हासिल करने वाले पात्र आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा का प्रावधान है।
हालांकि H-1B व्यवस्था में इससे कहीं ज्यादा संख्या में याचिकाएं और लाभार्थी दिखाई दे सकते हैं, क्योंकि कैप से अलग कुछ श्रेणियां और लगातार रोजगार से जुड़े मामले भी कार्यक्रम के आंकड़ों में शामिल होते हैं।
H-1B : भारतीय पेशेवरों के लिए क्या बदल सकता है
नई व्यवस्था के बाद H-1B आवेदन करने वाली कंपनियों की जांच ज्यादा कड़ी हो सकती है। खास तौर पर ऐसी कंपनियों के आवेदनों पर अतिरिक्त नजर रखी जा सकती है जहां हाल में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी हुई हो या जहां विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर नियुक्त करने के आरोप सामने आए हों।
इसके साथ ही 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था और चयन प्रक्रिया में बदलाव से कंपनियों के लिए अमेरिका के बाहर से नए H-1B कर्मचारियों को लाना महंगा और अधिक जटिल हो सकता है। इसका असर विशेष रूप से उन व्यवसायों पर पड़ सकता है जो बड़ी संख्या में H-1B कर्मचारियों का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय H-1B पेशेवरों पर कोई अलग से प्रतिबंध लगा दिया गया है। मौजूदा बदलाव राष्ट्रीयता के बजाय H-1B कार्यक्रम के प्रशासन, नियोक्ताओं की जांच, वेतन और कुछ मामलों में अमेरिका में प्रवेश की शर्तों से जुड़े हैं।
H-1B पर ट्रंप प्रशासन की रणनीति क्या है
ताजा फैसलों से स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन H-1B कार्यक्रम में ज्यादा निगरानी, उच्च वेतन वाले और अधिक कुशल कर्मचारियों को प्राथमिकता देने तथा अमेरिकी श्रमिकों की सुरक्षा पर जोर दे रहा है।
एक तरफ एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए सरकारी एजेंसियों के बीच डेटा साझा करने और नियोक्ताओं की जांच बढ़ाने की बात कही गई है, वहीं दूसरी तरफ 1 लाख डॉलर भुगतान वाली प्रवेश पाबंदी को आगे जारी रखा गया है।
भारतीय पेशेवरों के लिए इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि अमेरिका के H-1B कार्यक्रम में भारत की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। आने वाले समय में नियमों के क्रियान्वयन, कंपनियों की प्रतिक्रिया और संभावित कानूनी चुनौतियों से यह स्पष्ट होगा कि इन बदलावों का अमेरिकी टेक सेक्टर और भारतीय IT प्रोफेशनल्स पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ता है।


