रिपोर्ट- अंकित दुबे
Ghazipur News गाजीपुर के शादियाबाद से सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। एक आवारा पशु गंभीर हालत में करीब तीन दिनों तक जिंदगी के लिए संघर्ष करता रहा, लेकिन समय रहते उसे उपचार नहीं मिल सका। आखिरकार उपस्वास्थ्य केंद्र के पास ही उसने दम तोड़ दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि पशु को बचाने के लिए कई स्तरों पर सूचना दी गई, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से समय पर प्रभावी मदद नहीं पहुंची।
1962 हेल्पलाइन पर फोन के बाद भी नहीं मिली मदद
Ghazipur News ग्रामीण शक्ति चौबे के अनुसार, 1 सितंबर को उन्होंने सड़क किनारे गंभीर हालत में पड़े पशु को देखा था। इसके बाद संबंधित विभागों को सूचना दी गई। पशु को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर मेडिकल स्टोर से दवा लाकर उपचार देने की कोशिश भी की गई, लेकिन उसकी हालत लगातार बिगड़ती रही।
ग्रामीणों का कहना है कि पशु चिकित्सा सेवा की टोल फ्री हेल्पलाइन 1962 पर भी कई बार संपर्क किया गया। आरोप है कि कॉल के दौरान आवाज सुनाई नहीं देने की बात कहकर फोन काट दिया गया। इसके बाद 112 पुलिस सेवा को भी सूचना दी गई। पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन पशु के उपचार को पशु चिकित्सक की जिम्मेदारी बताते हुए वापस लौट गई।
पशु चिकित्सालय प्रभारी से संपर्क तक हो चुकी थी देर
Ghazipur News मामले की जानकारी मनिहारी पशु चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. जयप्रकाश यादव तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। कई बार संपर्क की कोशिश के बाद फोन रिसीव होने पर उन्हें स्थिति से अवगत कराया गया। हालांकि, तब तक पशु की हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी।
Ghazipur News इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सड़क पर घायल या बीमार आवारा पशुओं के लिए तत्काल रेस्क्यू और उपचार की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि हेल्पलाइन और सरकारी पशु चिकित्सालय की व्यवस्था मौजूद है, तो सूचना मिलने के बाद मौके पर टीम पहुंचने में देरी क्यों हुई, यह जांच का विषय है।
उपस्वास्थ्य केंद्र के पास मौत, संक्रमण का भी खतरा
Ghazipur News बताया गया कि बीमार पशु उपस्वास्थ्य केंद्र और आयुष्मान औषधि केंद्र के नजदीक पड़ा रहा। इसी परिसर में बच्चों और गर्भवती महिलाओं का उपचार और टीकाकरण भी किया जाता है। ऐसे स्थान के पास कई दिनों तक बीमार पशु का पड़े रहना और फिर उसकी मौत हो जाना स्वच्छता एवं संक्रमण नियंत्रण की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
मामले में ग्राम प्रधान अनिल कसौधन ने बताया कि उन्होंने सचिव को जानकारी देकर आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा था। वहीं ग्राम सभा की सचिव सुमित्रा पांडेय जानकारी मिलने के बाद मौके पर पहुंचीं और पशु को बचाने के लिए मदद का आश्वासन दिया। ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय पशु की हालत काफी खराब थी।
अब ग्रामीणों ने मृत पशु का शव तत्काल हटाने, पूरे मामले की जांच कराने और आवारा पशुओं के लिए प्रभावी रेस्क्यू एवं उपचार व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। सवाल यह भी है कि 1962 पर सूचना मिलने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई और 112 की सूचना के बाद पशु चिकित्सा विभाग से तत्काल समन्वय क्यों नहीं कराया गया। इन सवालों के जवाब संबंधित विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।


