Banbihari Temple Khairagarh: 300 साल पुराने मंदिर को संरक्षण का इंतजार, जन्माष्टमी पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
खैरागढ़ के जमातपारा में स्थित Banbihari Temple Khairagarh करीब 300 साल से अधिक पुरानी धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। जन्माष्टमी के पर्व पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और भगवान श्री राधा-कृष्ण की पूजा-अर्चना की। हालांकि, आस्था के इस प्राचीन केंद्र को आज भी संरक्षण और जरूरी सुविधाओं का इंतजार है।
मंदिर से जुड़ी जमीन पर कथित कब्जे और लगातार सीमित होते परिसर को लेकर स्थानीय लोगों में भी चिंता है। श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों का कहना है कि मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसके संरक्षण, सीमांकन और विकास की दिशा में ठोस पहल की आवश्यकता है।
Banbihari Temple Khairagarh: खैरागढ़ रियासत से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
Banbihari Temple Khairagarh के इतिहास को खैरागढ़ रियासत के शुरुआती दौर से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय इतिहास के जानकार भागवत शरण सिंह के अनुसार, खैरागढ़ रियासत के संस्थापक प्रथम नागवंशी राजा खड़गसिंह ने अपनी कृष्ण उपासक पत्नी के पूजा-अर्चना के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था।
बताया जाता है कि उस समय खैरागढ़ का यह क्षेत्र घने खैर के जंगलों से घिरा हुआ था। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण के नाम ‘बिहारी’ के साथ ‘वन’ शब्द को जोड़कर मंदिर का नाम ‘बनबिहारी’ पड़ा। मंदिर की पहचान आज भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी हुई है।
Banbihari Temple Khairagarh: कृष्ण की नृत्य मुद्राओं वाली प्रतिमाएं आज भी मौजूद
मंदिर के पुजारी धनंजय तिवारी के मुताबिक, मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की नृत्य मुद्राओं वाली प्राचीन प्रतिमाएं आज भी मौजूद हैं। पुराने समय में यहां साधु-संतों का जमावड़ा लगा करता था और श्रद्धालुओं को मालपुए का प्रसाद वितरित किए जाने की परंपरा भी रही है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, साधु-संतों के इसी जमावड़े और धार्मिक गतिविधियों के कारण मंदिर के आसपास के इलाके को ‘जमातपारा’ नाम मिला। इस तरह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि खैरागढ़ की पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है।
Banbihari Temple Khairagarh: जन्माष्टमी पर मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
जन्माष्टमी के अवसर पर Banbihari Temple Khairagarh में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में लोग मंदिर पहुंचे। पर्व के दौरान मंदिर में धार्मिक माहौल बना रहा और श्रद्धालुओं ने भगवान राधा-कृष्ण के दर्शन कर पूजा की।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर भी लोगों में उत्सुकता दिखाई दी। कई श्रद्धालु मंदिर के इतिहास और यहां मौजूद प्राचीन प्रतिमाओं के बारे में जानकारी लेते नजर आए। लोगों का कहना है कि मंदिर की पुरातन पहचान को देखते हुए यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्थाएं विकसित की जानी चाहिए।
Banbihari Temple Khairagarh: मंदिर की 3 से 4 एकड़ जमीन पर कब्जे का आरोप
मंदिर के पुजारी धनंजय तिवारी ने मंदिर से जुड़ी जमीन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके मुताबिक मंदिर की करीब 3 से 4 एकड़ जमीन पर कथित तौर पर कब्जा कर मकान बनाए गए हैं। उनका कहना है कि इसके चलते मंदिर का मूल परिसर पहले की तुलना में लगातार सीमित होता गया है।
स्थानीय लोगों ने मंदिर की जमीन का सीमांकन कराने और कथित कब्जे की स्थिति की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक मंदिर की जमीन और परिसर को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि भविष्य में इसके मूल स्वरूप और धार्मिक महत्व पर कोई असर न पड़े।
Banbihari Temple Khairagarh: डोम निर्माण और मूलभूत सुविधाओं की मांग
श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने मंदिर परिसर में डोम निर्माण सहित अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, ऐसे में परिसर में पर्याप्त सुविधाओं का होना जरूरी है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक Banbihari Temple Khairagarh को केवल एक धार्मिक स्थल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह खैरागढ़ की करीब तीन शताब्दी पुरानी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है। इसलिए मंदिर परिसर का संरक्षण, जमीन का सीमांकन और आवश्यक सुविधाओं का विकास प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए।
Banbihari Temple Khairagarh: संरक्षण नहीं हुआ तो प्रभावित हो सकती है ऐतिहासिक पहचान
स्थानीय लोगों का कहना है कि इतने पुराने मंदिर के संरक्षण के लिए संबंधित विभागों को पहल करनी चाहिए। मंदिर परिसर की स्थिति, जमीन से जुड़े विवादों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर आवश्यक कार्रवाई होने से इस प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
लोगों की मांग है कि मंदिर का व्यवस्थित सर्वेक्षण कराया जाए, भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए और संरक्षण की योजना तैयार की जाए। इससे आने वाली पीढ़ियों को भी खैरागढ़ की इस ऐतिहासिक धार्मिक विरासत से परिचित कराया जा सकेगा।
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