Forest Rights Act: वन अधिकार अधिनियम को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासत गरम, चरणदास महंत ने राष्ट्रपति से किया हस्तक्षेप का आग्रह

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Forest Rights Act: छत्तीसगढ़ में वन अधिकार अधिनियम के कथित उल्लंघन को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर राज्य में वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से लागू कराने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि हजारों आदिवासी और वन निवासी परिवार आज भी अपने कानूनी अधिकारों से वंचित हैं।

Forest Rights Act: 50 हजार से अधिक परिवारों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप

राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में डॉ. महंत ने कहा है कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) के तहत वन क्षेत्रों के जलाशयों में मछली पालन और अन्य वन उत्पादों पर सामुदायिक अधिकार स्थानीय आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों को दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि कानून लागू होने के 18 वर्ष बाद भी इसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया है।

महंत के अनुसार छत्तीसगढ़ की वन भूमि पर लगभग 1 लाख 58 हजार हेक्टेयर जलक्षेत्र मौजूद है, जिससे 50 हजार से अधिक आदिवासी और वन निवासी परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। उनका कहना है कि इन समुदायों को उनके वैधानिक अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं।

Forest Rights Act: ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने का आरोप, राष्ट्रपति से कार्रवाई की मांग

नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि वर्तमान मछली पालन नीति के तहत बड़े जलाशयों को पट्टे और टेंडर के माध्यम से ठेकेदारों को सौंपा जा रहा है। इससे स्थानीय आदिवासी और वन निवासी समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित होकर मजदूरी करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

Forest Rights Act: पत्र में राष्ट्रपति से आग्रह किया गया है कि आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों के आर्थिक एवं कानूनी हितों की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल लागू कराने हेतु हस्तक्षेप किया जाए। साथ ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री को आवश्यक निर्देश जारी कर प्रभावित परिवारों को उनके अधिकार दिलाने की पहल की जाए।

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डॉ. महंत ने कहा कि यह केवल कानूनी अधिकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका और सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय है, जिस पर शीघ्र निर्णय लिया जाना आवश्यक है।

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