BY
Yoganand Shrivastava
बांग्लादेश में कथित ‘ईशनिंदा’ के आरोप कट्टरपंथियों के लिए सबसे खतरनाक हथियार बनते जा रहे हैं। ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) की रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में बिना किसी ठोस सबूत के हिंदुओं पर आरोप लगाए गए, जिसके बाद भीड़ ने हिंसा, लूटपाट और आगजनी को अंजाम दिया। इन घटनाओं में न केवल निर्दोष लोगों की जान गई, बल्कि पूरे के पूरे गांव तबाह हो गए।
सुनामगंज का शाल्ला: पूरा गांव खाक
सुनामगंज जिले के शाल्ला क्षेत्र में एक कथित फेसबुक पोस्ट के बाद हाल के वर्षों का सबसे भयावह हमला देखने को मिला। आरोप है कि सोशल मीडिया अकाउंट को हैक कर आपत्तिजनक पोस्ट डाली गई, जिसके बाद भीड़ ने हिंदू बस्ती पर हमला बोल दिया। करीब 400 से अधिक अल्पसंख्यक परिवारों के घरों में लूटपाट की गई और फिर उन्हें जला व तोड़ दिया गया।
रंगपुर के गंगाचरा में 22 घर तोड़े गए
रंगपुर जिले के गंगाचरा इलाके में एक 17 वर्षीय हिंदू किशोर पर आरोप लगने के बाद हालात बेकाबू हो गए। दंगाइयों ने 22 हिंदू परिवारों के घरों में तोड़फोड़ की, जिससे सभी परिवारों को जान बचाने के लिए रातोंरात घर छोड़कर भागना पड़ा।
खुलना और बरिशाल के विवादित मामले
खुलना के डाकोप क्षेत्र में जांच के दौरान यह सामने आया कि देवी काली के अपमान का कृत्य एक मुस्लिम व्यक्ति ने किया था, लेकिन गिरफ्तार हिंदू युवक पुरबायन मंडल को कर लिया गया। असली आरोपी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह बरिशाल के गौरनदी में एक नाबालिग हिंदू युवक को बिना पर्याप्त जांच के हिरासत में ले लिया गया।
चार जिलों में एक जैसा पैटर्न
मौलवीबाजार, फरीदपुर, चांदपुर और कुमिल्ला जिलों में सामने आए मामलों में एक चिंताजनक समानता देखी गई। पहले किसी हिंदू पर आरोप लगाया गया, फिर अचानक भीड़ इकट्ठा हुई, इसके बाद पुलिस ने बिना पुख्ता जांच के आरोपी हिंदू को हिरासत में ले लिया और अंत में अल्पसंख्यक परिवारों व गांवों पर हमले शुरू हो गए।
डर, धमकी और पलायन की मजबूरी
कई मामलों में आरोपों के झूठे या विरोधाभासी साबित होने के बावजूद हिंदू परिवारों को लगातार धमकाया गया। सामाजिक बहिष्कार किया गया और उन्हें अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासनिक ढिलाई और भीड़ की मानसिकता ने मिलकर इन घटनाओं को और भयावह बना दिया।
मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
HRCBM का कहना है कि जब तक झूठे आरोपों पर तुरंत और निष्पक्ष जांच नहीं होगी तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का यह सिलसिला रुकना मुश्किल है।





