रिपोर्ट- लोकेश्वर सिन्हा
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक स्थित उरमाल गांव की माध्यमिक शाला की शिक्षिका मीना देवांगन, गुरु के सच्चे स्वरूप की मिसाल हैं। पिछले 27 वर्षों से वे निस्वार्थ भाव से बच्चों को शिक्षा दे रही हैं, वह भी तब, जब स्वयं शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं।
त्रि-साइकिल पर स्कूल, लेकिन हौसले फौलादी
मीना मैडम हर मौसम में अपनी ट्राइसाइकिल पर सवार होकर स्कूल पहुंचती हैं—ना बारिश रोक पाती है, ना धूप और ना ही ठंड। उनका समर्पण और अनुशासन बच्चों के साथ-साथ गांववालों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत है। गांववाले गर्व से कहते हैं—“अगर गुरु हो तो मीना मैडम जैसी हो।”
दिव्यांगता नहीं, दृढ़ संकल्प बनी पहचान
मीना देवांगन मानती हैं कि दिव्यांगता कोई बाधा नहीं, बल्कि ईश्वर का आशीर्वाद है। उन्होंने न केवल शिक्षण के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि अन्य दिव्यांग युवाओं को भी जीवन में आगे बढ़ने का हौसला दिया।
पीढ़ियों ने उन्हें गुरु माना
गांव में उनकी छवि केवल एक शिक्षिका की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक की है। कई छात्र जो उनके सान्निध्य में पढ़े, आज माता-पिता बन चुके हैं और अब अपने बच्चों को भी उन्हीं से पढ़वा रहे हैं।
गुरु पूर्णिमा पर विशेष सम्मान
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर समाज ऐसी शिक्षिकाओं को नमन करता है, जो हर परिस्थिति में बच्चों का भविष्य संवारने में जुटी हैं। मीना देवांगन जैसी शिक्षिकाएं वास्तव में समाज की “जीती-जागती प्रेरणा” हैं।





