फिल्मों में महिलाओं का जलवा, माधुरी से दीपिका तक क्रांति
BY: Vijay Nandan
मुम्बई: महिला दिवस पर स्वदेश न्यूज बॉलीवुड में महिलाओं की यात्रा का जश्न मना रहा है। नूतन, मधुबाला से लेकर विद्या, प्रियंका और दीपिका तक, अभिनेत्रियों ने सशक्त किरदारों से सिनेमा को बदला है। रानी और तापसी ने सामाजिक संदेश दिए। जोया, मेघना और किरण जैसी निर्देशक, जूही और कनिका जैसी लेखिकाओं ने कहानियों को नई दिशा दी है। एकता, अनुष्का जैसी निर्माता फिल्म निर्माण में विविधता लाईं। महिलाओं ने अपनी मधुर आवाज से बॉलीवुड को समृद्ध किया है। बदलते दौर में इस इंड़स्ट्री के चाल चरित्र में भी परिवर्तन तो आया है लेकिन आज भी महिलाएं बॉलीवुड में कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं. पढ़िए
माधुरी दीक्षित ने अपने 39 साल के करियर के अनुभव साझा किए
मायानगरी और सपनों की दुनिया, जहां है हुस्न का संसार, और बसती हैं सपनों की मल्लिकाएं यानि बॉलीवुड में महिलाओं की वो भूमिकाएं जो सबको अपनी और आकर्षित तो करती ही हैं प्रेरणा भी देती है. 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्वदेश न्यूज बॉलीवुड की उन महिलाओं की कहानियों को नए नजरिए दिखा रहा है..जिन्होंने इस उद्योग को केवल अपने टैलेंट से नहीं, बल्कि अपनी मेहनत, जुनून और समाज को बदलने की चाह से समृद्ध किया है। बॉलीवुड सिर्फ फिल्मों का कारोबार नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच है जो सपनों को सच करता है, और इस मंच पर महिलाएं हर भूमिका में अपनी छाप छोड़ रही हैं। अभिनेत्री, निर्देशक, लेखक, निर्माता, कोरियोग्राफर, गायिका, तकनीकी विशेषज्ञ से लेकर स्टंटवुमन, मेकअप आर्टिस्ट, और सामाजिक प्रभावशाली व्यक्तित्व तक. फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र में महिलाएं अपना मुख्य योगदान दे रही हैं. अभिनेत्री माधुरी दीक्षित ने अपने 39 साल के करियर के अनुभव साझा किए.

अब एक्शन हीरो की भूमिकाएं निभा रही नायिकाएं
बॉलीवुड में अभिनेत्रियों की यात्रा शुरुआती दौर से लेकर आज तक एक क्रांतिकारी बदलाव की कहानी कहती है। नूतन, मधुबाला और मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों ने अपने समय में भावनात्मक गहराई और सौंदर्य से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। लेकिन आज की अभिनेत्रियां जैसे फिल्म कहानी की विद्या बालन, फिल्म मैरी कॉम की प्रियंका चोपड़ा और फिल्म पदमावत की दीपिका पादुकोण न केवल अभिनय में बल्कि किरदारों के चयन में भी साहस दिखा रही हैं। ये महिलाएं अब केवल नायक की प्रेमिका या पारंपरिक नारी की छवि तक सीमित नहीं हैं। फिल्म “मर्दानी” में रानी मुखर्जी ने एक सशक्त पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाकर यह दिखाया कि महिलाएं भी एक्शन हीरो हो सकती हैं। वहीं, फिल्म “थप्पड़” में तापसी पन्नू ने घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाकर सामाजिक संदेश दिया। ये अभिनेत्रियां नई पीढ़ी को यह सिखा रही हैं कि अपनी शर्तों पर जीना और सपनों को हासिल करना संभव है। फिल्म निर्माता गुनीत मोंगा मानती हैं कि भारतीय सिनेमा में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है, ये बदलाव भविष्य के लिए उम्मीद जगाता है।
निर्देशन में भी महिलाएं दिखा रहीं दम
अभिनय के साथ ही फिल्म निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण कार्य निर्देशन में महिलाओं का योगदान पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली हो गया है। जोया अख्तर निर्देशित फिल्म “दिल धड़कने दो”, मेघना गुलजार निर्देशित फिल्म “तलवार” ने जटिल मानवीय रिश्तों और सामाजिक मुद्दों को संवेदनशीलता से पेश किया। वहीं, किरण राव ने “धोबी घाट” जैसी फिल्म से कला सिनेमा को नई दिशा दी। नंदिता दास ने “मंटो” बनाकर इतिहास और साहित्य को सिनेमा से जोड़ा।

सपनों की दुनिया पर महिलाओं का राज
उधर लेखन के क्षेत्र में भी महिलाओं ने बॉलीवुड को नई सोच दी है। जूही चतुर्वेदी की “अक्टूबर” और “गुलाबो सिताबो” जैसी फिल्मों ने साधारण जीवन की गहरी कहानियों को उभारा। कनिका ढिल्लों ने “मणिकर्णिका” और “केदारनाथ” जैसी स्क्रिप्ट्स से इतिहास और आध्यात्मिकता को सशक्त महिला किरदारों के साथ जोड़ा। गौरी शिंदे की “डियर जिंदगी” ने मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय को महिलाओं के नजरिए से पेश किया। ये लेखिकाएं न केवल कहानियां लिखती हैं, बल्कि समाज में जागरूकता लाने और रूढ़ियों को तोड़ने का काम भी करती हैं। इसके साथ ही फिल्म निर्माण के क्षेत्र में महिलाएं अब बड़े जोखिम ले रही हैं। जिनमें एकता कपूर, अनुष्का शर्मा, अपर्णा सेन और तनुजा चंद्रा ने क्षेत्रीय और कला सिनेमा को बढ़ावा देकर विविधता लाई। कोरियोग्राफी में सरोज खान, वैभवी मर्चेंट और मधुरिता सरंगी जैसी महिलाओं ने बॉलीवुड के गानों को नया जीवन दिया। बात करें फिल्म की आत्मा संगीत की तो लता मंगेशकर और आशा भोसले ने बॉलीवुड को अपनी आवाज से अमर बना दिया। आज श्रेया घोषाल, नेहा कक्कड़, और सुनिधि चौहान जैसी गायिकाएं हर शैली में अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं। एडिटिंग, मेकअप, कैमरा वर्क, समेत फिल्म निर्माण की सभी विधाओं में महिलाएं अपना लोहा मनवा रही हैं.
MeToo से बदला बॉलीवुड का ट्रेंड
लेकिन महिलाओं के लिए ये सपनों की दुनिया हमेशा से ही कठिन रही है, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. वेतन असमानता, यौन उत्पीड़न, और सीमित अवसर जैसी चुनौतियां आज भी कायम है.. हालांकि #MeToo जैसे आंदोलनों और बढ़ती जागरूकता से बदलाव भी आ रहा है। इसमें सबसे सकारात्मक बदलाव की राह हमारी सनातन संस्कृति दिखा रही है..महिला शक्ति प्राचीन काल से ही पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती आई हैं। भविष्य में भी महिलाएं न केवल बॉलीवुड में हिस्सेदार होंगी, बल्कि इसे नेतृत्व भी देंगी। बॉलीवुड की महिलाएं हमें सिखाती हैं कि सपने, साहस और मेहनत से कोई भी क्षेत्र जीता जा सकता है। महिलाएं न केवल सिनेमा की शक्ति हैं, बल्कि समाज की प्रेरणा भी हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उन सभी नायिकाओं को हमारा सलाम है। जिन्होंने फिल्म निर्माण से जुड़े हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई और अपने दम पर बॉलीवुड में नई ऊंचाइयों को छुआ।
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