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बलूचिस्तान पर भारतीय मीडिया का भटकाव, एक गंभीर आत्ममंथन की ज़रूरत: BNM

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बलूचिस्तान पर झूठा नैरेटिव क्यों फैला रहा है भारतीय मीडिया ?

BY: VIJAY NANDAN

हाल के दिनों में कुछ भारतीय मीडिया संस्थान जिस तरह बलूचिस्तान के मुद्दे को प्रस्तुत कर रहे हैं, वह न केवल भ्रामक है, बल्कि बलूचों की स्वतंत्रता की वैध लड़ाई को अनजाने में नुकसान पहुंचाने वाला भी बनता जा रहा है। पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसियों द्वारा बलूचिस्तान में दशकों से जारी अत्याचार, जबरन गायबियां, हत्याएं और मानवाधिकार हनन की घटनाओं को बलपूर्वक छिपाया जाता है — और दुर्भाग्यवश, अब भारतीय मीडिया का एक हिस्सा भी उसी प्रचार तंत्र का हिस्सा बनता दिख रहा है।

भ्रामक खातों और झूठे दावों से नुकसान

हाल में “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” नामक एक झूठे ट्विटर अकाउंट और AI जनरेटेड इमेज के माध्यम से एक भ्रामक अभियान चलाया गया। यह अकाउंट न तो बलूच जनता का प्रतिनिधित्व करता है, न ही किसी विश्वसनीय संगठन से जुड़ा है। फिर भी, कुछ भारतीय न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स ने इस नकली अकाउंट को बलूच प्रतिनिधि मानकर प्रचारित किया। क्या बलूचिस्तान इतनी आसानी से स्वतंत्र हो गया? क्या पाकिस्तानी सेना ने पीछे हटने की घोषणा की? नहीं! यह पूरी तरह से झूठ है।

बलूचिस्तान आज भी पाकिस्तान की सेना के कब्ज़े में है। 27 मार्च 1948 को बलूचिस्तान पर बलपूर्वक कब्जा किया गया था। तब से आज तक बलूच जनता अपने आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही है।

अरुण शौरी का बयान: दुर्भाग्यपूर्ण और अपमानजनक

काज़ी दाद मोहम्मद रेहान, सूचना एवं सांस्कृतिक सचिव, बलूच नेशनल मूवमेंट (BNM) का कहना है कि सबसे अधिक दुःख की बात यह रही कि भारत के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी का सोशल मीडिया पर वायरल एक बयान बेहद निराशाजनक है. जिसमें वे कह रहे हैं कि बलूच भारत में आतंकी हमले करते हैं ताकि भारत, पाकिस्तान को नुकसान पहुंचा सके।” यह बयान केवल झूठा ही नहीं, बल्कि बलूच राष्ट्र के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला है।

बलूच आतंकवादी नहीं हैं। हमने कभी किसी और की ज़मीन पर गोली नहीं चलाई। हम अपने अधिकारों, पहचान और आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह हमारा प्राकृतिक, राजनीतिक और नैतिक अधिकार है। क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, या काडू मकरानी आतंकवादी थे? नहीं! वे स्वतंत्रता सेनानी थे। ठीक उसी तरह बलूच भी स्वतंत्रता सेनानी हैं।

मोदी सरकार ने दिया था समर्थन, मीडिया क्यों भटक रहा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में लाल किले से बलूच भाइयों और बहनों का ज़िक्र कर स्पष्ट संकेत दिया था कि भारत बलूचिस्तान में हो रहे दमन से वाकिफ है और बलूच जनता के साथ खड़ा है। ऐसे में भारत की मीडिया का यह कर्तव्य बनता है कि वह बलूच मुद्दे को गंभीरता, जिम्मेदारी और सत्यता के साथ पेश करे — न कि किसी फेक अकाउंट या अज्ञात व्यक्ति को “बलूच नेता” घोषित कर, मज़ाक बना दे।

झूठ को बढ़ावा देना समर्थन नहीं, चोट पहुंचाना है

बलूच राष्ट्रीय आंदोलन की गरिमा और गंभीरता को नुकसान पहुंचाना, वास्तव में पाकिस्तान के दमनकारी शासन को फायदा पहुंचाना है। जो भारतीय मीडिया आज इस तरह के झूठे प्रचार को जगह दे रहा है, वह अनजाने में पाकिस्तानी सेना की रणनीति को मज़बूत कर रहा है। यह “समर्थन” नहीं, बल्कि “उल्टा वार” है।

बलूच संघर्ष को समर्थन देना है तो सत्य के साथ दीजिए। झूठे चेहरों और फर्जी खातों के माध्यम से नहीं। बलूच मुद्दे को एक खिलौना मत बनाइए।

अपील: भारतीय मीडिया से ईमानदार संवाद की उम्मीद

काज़ी दाद मोहम्मद रेहान: मैं भारतीय मीडिया से अपील करता हूं कि वे केवल विश्वसनीय और ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे बलूच संगठनों और नेताओं से संवाद करें। प्रचार के बजाय जानकारी, सनसनी के बजाय संवेदनशीलता, और झूठ के बजाय ऐतिहासिक सत्य को जगह दें। बलूच जनता संघर्षरत है — आज़ादी के लिए, इंसाफ के लिए, अस्तित्व के लिए। इस लड़ाई को गलत ढंग से पेश करना, हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने के समान है।


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