BY: Yoganand Shrivastava
हिंदी सिनेमा की दुनिया में कई कलाकार आए और गए, लेकिन कुछ ऐसे नाम भी रहे जिन्होंने अपनी अदाकारी से इतिहास रच दिया। उन्हीं में से एक थे प्राण, जिनके बिना हिंदी फिल्मों की खलनायकी अधूरी मानी जाती है। उन्होंने अपने अभिनय से इस कदर छाप छोड़ी कि लोग पर्दे पर उन्हें देखकर घृणा करने लगे, मगर पर्दे के पीछे वही शख्स बेहद सज्जन और सौम्य व्यक्तित्व वाला था।
12 जुलाई को प्राण की पुण्यतिथि होती है और इस मौके पर एक नजर डालते हैं उस अभिनेता के जीवन पर, जो कभी हिंदी सिनेमा का सबसे डरावना चेहरा बन गया था।
सफेद-स्याह पर्दे से शुरू हुआ था खौफ का सफर
प्राण का जन्म 12 फरवरी 1920 को लाहौर में हुआ था। उनका पूरा नाम था प्राण कृष्ण सिकंद अहलूवालिया। वे एक समृद्ध पंजाबी हिंदू परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता केवल कृष्ण सिकंद पेशे से सिविल इंजीनियर और सरकारी ठेकेदार थे। प्राण की स्कूली शिक्षा लाहौर, कपूरथला, मेरठ, देहरादून और रामपुर में हुई थी।
प्राण शुरू से अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। वे एक फ़ोटोग्राफर बनना चाहते थे और लाहौर में एक पेशेवर फोटोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन अभिनय का चस्का तब लगा जब उन्होंने शिमला की एक रामलीला में ‘सीता’ की भूमिका निभाई।
पहली फिल्म और खलनायकी की शुरुआत
उनका फिल्मी करियर साल 1940 में पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ से शुरू हुआ। इस फिल्म में उन्होंने खलनायक की भूमिका निभाई थी। मगर हिंदी सिनेमा में उनकी शुरुआत 1942 में फिल्म ‘खानदान’ से हुई, जिसमें उन्होंने नायक की भूमिका निभाई थी।
प्राण ने 1947 के भारत विभाजन के बाद लाहौर छोड़ दिया और मुंबई (तब बंबई) आकर बस गए। विभाजन के बाद कई फिल्मों के ऑफर छूट गए थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मुंबई आने के बाद उन्होंने फिल्म ‘जिद्दी’ से दोबारा पहचान बनाई। उस फिल्म में उनके साथ थे देव आनंद और कामिनी कौशल।
1950 और 60 के दशक में दहशत का दूसरा नाम था ‘प्राण’
1950 और 1960 का दशक प्राण के करियर का स्वर्णिम काल था। इस दौर में उन्होंने कई सुपरहिट फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई। उनकी आवाज, चाल, आंखों की तीव्रता और संवाद अदायगी इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक उन्हें असली जीवन में भी खलनायक मानने लगे थे।
उनकी चर्चित फिल्मों में ‘मधुमती’ (1958), ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960), ‘राम और श्याम’ (1967), ‘बॉबी’ (1973) और ‘डॉन’ (1978) शामिल हैं। इन फिल्मों में उनके निभाए गए किरदारों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे खौफनाक और यादगार विलेन बना दिया।
ऐसा खलनायक, जिसे देखकर लोग गालियां देते थे
प्राण की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी वर्सेटिलिटी। वे केवल खलनायक तक सीमित नहीं थे, उन्होंने सहायक भूमिकाएं भी निभाईं और कई बार तो हास्य और भावुक किरदारों में भी दिखाई दिए। लेकिन खलनायकी में उनका जलवा सबसे अलग था।
एक समय ऐसा भी आया जब माता-पिता अपने बच्चों का नाम ‘प्राण’ रखने से कतराने लगे थे। ऐसा असर था उनके परदे के किरदारों का। मगर वही प्राण जब एक फिल्म में नायक की भूमिका निभाते, तो दर्शक उन्हें खूब प्यार भी देते।
बॉलीवुड का सबसे महंगा विलेन
साल 1969 से लेकर 1982 तक प्राण बॉलीवुड के सबसे महंगे खलनायक थे। निर्माता-निर्देशक उनकी फीस पर समझौता नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनके नाम भर से ही फिल्म हिट होने की गारंटी बन जाती थी।
प्राण ने ही मशहूर फिल्म ‘जंजीर’ (1973) के लिए निर्माता प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था, जब कोई भी अमिताभ को कास्ट करने को तैयार नहीं था। इस फिल्म ने अमिताभ को ‘एंग्री यंग मैन’ का टैग दिलाया और उनका करियर चमका दिया।
सम्मान और पुरस्कार
प्राण को उनकी अदाकारी के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया।
- 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।
- 2000 में स्टारडस्ट द्वारा उन्हें ‘विलेन ऑफ द मिलेनियम’ का खिताब दिया गया।
- 2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
- 2013 में उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया, जो उन्हें उनके घर पर ही सौंपा गया क्योंकि उनकी तबीयत खराब थी।
अंतिम विदाई
12 जुलाई 2013 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में 93 वर्ष की आयु में प्राण का निधन हुआ। उनके जाने के बाद केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक युग समाप्त हो गया। आज भी जब कोई अभिनेता खलनायकी के शिखर पर पहुंचने की कोशिश करता है, तो तुलना प्राण से ही होती है।





