BY: Yoganand Shrivastva
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे केस में अहम टिप्पणी दी है, जिसमें पति पर अपनी पत्नी की अप्राकृतिक मृत्यु के बाद दहेज हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता जैसे संगीन आरोप लगे थे। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि विवाहेतर संबंध पत्नी को मानसिक कष्ट देने के लिए बनाए गए थे, तब तक ऐसे संबंध IPC की धारा 498A या 306 के तहत अपराध नहीं माने जा सकते।
कोर्ट का स्पष्ट रुख: विवाहेतर संबंध हमेशा अपराध नहीं
जस्टिस संजीव नरूला की पीठ ने साफ कहा कि:
- विवाहेतर संबंध को तभी अपराध माना जाएगा, जब ये पत्नी को मानसिक यातना देने या उसे प्रताड़ित करने के इरादे से किए गए हों।
- यदि ऐसा इरादा साबित नहीं होता, तो ये IPC की धारा 498A (क्रूरता) या धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसावा) के तहत नहीं आता।
कोर्ट ने कहा:
“यह मानते हुए भी कि पति का अवैध संबंध था, जब तक यह साबित नहीं होता कि इसका उद्देश्य पत्नी को मानसिक कष्ट देना था, तब तक इसे आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।”
मामला: पत्नी की मृत्यु और पति पर गंभीर आरोप
यह केस उस समय सामने आया जब 18 मार्च 2024 को महिला की संदिग्ध मृत्यु के बाद पति को गिरफ्तार किया गया। उस पर IPC की निम्न धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ:
- 498A – मानसिक या शारीरिक क्रूरता
- 304B – दहेज हत्या
- 306 – आत्महत्या के लिए उकसाना
परिवार ने आरोप लगाया कि पति:
- अपनी सहकर्मी के साथ अवैध संबंध में था
- पत्नी से मारपीट करता था
- पत्नी की खरीदी हुई कार की EMI के लिए दबाव डालता था
डिजिटल सबूत और कोर्ट का नजरिया
अभियोजन पक्ष ने वीडियो और चैट रिकॉर्ड कोर्ट में पेश किए। कोर्ट ने माना कि संबंध हो सकते हैं, लेकिन यह दहेज हत्या या मानसिक क्रूरता का पर्याप्त आधार नहीं बनते।
कोर्ट का कहना:
- विवाहेतर संबंध स्वतः अपराध नहीं हैं
- आरोपों को दहेज की मांग या अंतिम समय की प्रताड़ना से जोड़ना जरूरी है
- पहले कोई शिकायत दर्ज न होने से दहेज उत्पीड़न का आरोप कमजोर हो गया





