क्या पीएम मोदी का ‘संघम शरणम् गच्छामि’ सुलह की कोशिश ?
BY: Vijay Nandan
नागपुर: लगभग 14 वर्षों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के केशव कुंज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कदम रखा। इस दौरान उन्होंने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और संगठन के दूसरे प्रमुख श्रद्धेय माधवराव सदाशिवराव गोवलकर ‘गुरुजी’ को श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस अवसर पर पीएम मोदी ने एक भावपूर्ण संदेश भी लिखा। मौजूदा संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ उनकी गर्मजोशी और आत्मीयता भी देखने को मिली। पीएम मोदी और मोहन भागवत के बीच इस दौरान कई बार बातचीत भी हुई। 1987 में संघ से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में आए पीएम मोदी लंबे अंतराल के बाद संघ मुख्यालय के नए रूप में नजर आए।
बीच-बहस का बड़ा कारण: संघ और बीजेपी में मतभेद होना
पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयानों और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच मतभेद की चर्चा जोरों पर रही है। भागवत के बयान, जो धार्मिक विवादों से दूरी और भारतीय नागरिकों की साझा पहचान पर जोर देते हैं, बीजेपी की आक्रामक रणनीति से अलग दिखे। इस बीच, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का चुनावी मौके पर बयान—”बीजेपी को अब संघ की जरूरत नहीं”—ने इस तनाव को और बढ़ाया। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नागपुर स्थित संघ मुख्यालय का दौरा कई सवाल उठाता है। क्या यह तल्खी को मिटाने की कोशिश है? क्या यह दौरा पीएम मोदी के मन में छिपे भाव “तेरे दर पर आया हूँ” को दर्शाता है? क्या मोहन भागवत और मोदी के बीच अगले बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति पर भी बात हुई होगी? आइए, इस पूरे मामले का विश्लेषण करें।

मोहन भागवत के बयान: एकता पर जोर, विवाद से दूरी
मोहन भागवत ने सामाजिक सौहार्द और एकता पर बल देते हुए कहा:
- “हर मस्जिद में मंदिर ढूंढने की जरूरत नहीं, क्योंकि भारत के नागरिकों का डीएनए एक है—हम सब भाई-बहन हैं।”
- “अतीत के विवाद भूल जाइए, हमारा डीएनए हमें बताता है कि हम एक ही मिट्टी से बने हैं।”
- “इतिहास को कुरेदने से क्या फायदा? हमारा डीएनए चीख-चीखकर कहता है कि भारत एकजुट राष्ट्र है।”
- हर जगह मतभेद ढूंढने से बेहतर है कि हम अपने डीएनए की एकता को सेलिब्रेट करें।”
- हमें हर मस्जिद में मंदिर ढूंढने की बजाय हर दिल में इंसानियत तलाश करनी चाहिए”
- मस्जिद हो या मंदिर, दोनों ही प्रार्थना के स्थान हैं; इनमें झगड़ा क्यों पैदा करना?”
- “अतीत को कुरेदने से बेहतर है कि हम भविष्य के लिए एक मजबूत नींव बनाएं।””धर्म के नाम पर विवाद पैदा करना हमारी संस्कृति नहीं, बल्कि एकता हमारा असली धन है।”
- “हर इमारत के नीचे इतिहास नहीं खोजा जा सकता, लेकिन हर इंसान के भीतर भाईचारा जरूर पाया जा सकता है।”
- “मंदिर और मस्जिद को लेकर बहस करने से अच्छा है कि हम शिक्षा और विकास पर ध्यान दें।”
- “जो बीत गया, उसे छोड़ दो; जो सामने है, उसे गले लगाओ—यही सच्ची प्रगति है।”
ये बयान संघ के उस दृष्टिकोण को रेखांकित करते हैं, जो हिंदुत्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ सामाजिक एकता पर केंद्रित है। यह बीजेपी की उस रणनीति से अलग है, जो अयोध्या के बाद काशी और मथुरा जैसे मुद्दों को उछाल रही है।

जेपी नड्डा का बयान: बीजेपी की स्वतंत्रता का दावा
लोकसभा चुनाव के दौरान जेपी नड्डा ने कहा कि बीजेपी अब एक स्वतंत्र और परिपक्व संगठन है, जिसे संघ की वैचारिक छत्रछाया की जरूरत नहीं। यह बयान उस समय आया जब बीजेपी को 240 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत से कम पर रुकना पड़ा। नड्डा का यह कहना कि “संघ एक वैचारिक संगठन है, लेकिन बीजेपी अपनी राह खुद चुनती है,” संघ के लिए अप्रत्याशित था, जिसने दशकों तक बीजेपी को संगठनात्मक और वैचारिक समर्थन दिया।
तनाव के कारण: वैचारिक और रणनीतिक मतभेद
संघ और बीजेपी के बीच तनाव के पीछे कई कारण हैं:
- वैचारिक अंतर: संघ दीर्घकालिक सांस्कृतिक परिवर्तन पर जोर देता है, जबकि बीजेपी चुनावी जीत और ध्रुवीकरण पर केंद्रित है।
- संगठनात्मक दृष्टिकोण: मोदी और अमित शाह ने बीजेपी को केंद्रीकृत और व्यक्तित्व-प्रधान बनाया, जो संघ के सामूहिक नेतृत्व के मॉडल से टकराता है।
- चुनावी प्रदर्शन: 2024 के चुनाव में बीजेपी की सीटें कम होना संघ के लिए चिंता का विषय बना। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, संघ ने बीजेपी के अति आत्मविश्वास को इसका कारण माना।
मोदी का नागपुर दौरा: “तेरे दर पर आया हूँ” का भाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नागपुर दौरा और मोहन भागवत से मुलाकात बेहद प्रतीकात्मक है। नागपुर संघ का गढ़ है, और यहाँ आना एक तरह से अपनी जड़ों की ओर लौटने का संकेत देता है। क्या यह दौरा पीएम मोदी के मन में छिपे भाव “तेरे दर पर आया हूँ” को व्यक्त करता है? एक पूर्व प्रचारक के तौर पर मोदी संघ के प्रति अपनी निष्ठा को भूले नहीं हैं। यह मुलाकात निम्न उद्देश्यों को पूरा कर सकती है:
- सुलह की कोशिश: नड्डा के बयान और भागवत के रुख से उपजे तनाव को कम करने की पहल हो सकती है। “तेरे दर पर आया हूँ” का भाव यह संदेश देता है कि मोदी संघ के समर्थन और मार्गदर्शन को महत्व देते हैं।
- बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति: नड्डा का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। नए अध्यक्ष की नियुक्ति में संघ की भूमिका अहम हो सकती है। क्या मोदी ने भागवत से इस पर सलाह मांगी? यह संभव है कि दोनों ने इस मुद्दे पर विचार-विमर्श किया हो।
- आगामी रणनीति: 2025 में बिहार और अन्य राज्यों के चुनाव हैं। संघ का जमीनी नेटवर्क बीजेपी के लिए अब भी जरूरी है। इस मुलाकात में भावी रणनीति पर सहमति बन सकती है।
संघ और मोदी सरकार के संबंध: एक जटिल गठजोड़
संघ और बीजेपी का रिश्ता सहयोग और तनाव का मिश्रण है। 2014 और 2019 में मोदी की जीत में संघ का योगदान था, लेकिन बीजेपी ने धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। आर्थिक उदारीकरण और कुछ सामाजिक मुद्दों पर सरकार ने संघ की सलाह को नजरअंदाज किया। फिर भी, संघ का प्रभाव बीजेपी की विचारधारा और संगठन पर बना हुआ है। मोदी का यह दौरा “तेरे दर पर आया हूँ” के भाव के साथ उस पुराने रिश्ते को मजबूत करने की कोशिश हो सकता है।
विश्लेषकों की राय
- कुछ विश्लेषक इसे औपचारिक मुलाकात मानते हैं, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए।
- अन्य का कहना है कि संघ बीजेपी को अपनी वैचारिक जड़ों की ओर लौटने का संदेश दे रहा है, खासकर जब पार्टी सहयोगियों पर निर्भर है।
- तीसरा मत यह है कि यह दोनों की मजबूरी का नतीजा है—बीजेपी को संघ का संगठन चाहिए, और संघ को बीजेपी की सत्ता।
संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों और जेपी नड्डा की टिप्पणी ने संघ-बीजेपी संबंधों में दरार को उजागर किया। मोदी का नागपुर दौरा, जिसमें “तेरे दर पर आया हूँ” का भाव झलकता है, इस तनाव को कम करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। अगले बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति और चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई हो या नहीं, यह मुलाकात दोनों पक्षों के लिए जरूरी संदेश देती है। संघ और बीजेपी एक-दूसरे के पूरक हैं, और यह रिश्ता सहयोग के साथ-साथ वैचारिक खींचतान का भी मिश्रण बना रहेगा। आने वाला समय ही बताएगा कि यह मुलाकात कितनी प्रभावी साबित होती है।
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