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जब हेडगेवार ने 17 लोगों के साथ शुरू किया आरएसएस का सफर

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विजयादशमी 1925: जिस दिन हेडगेवार ने आरएसएस की नींव रखी

भारत के इतिहास में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो समय की धारा को मोड़ देते हैं। 27 सितंबर 1925, विजयादशमी का दिन, ऐसा ही एक अवसर था। इस दिन नागपुर के एक साधारण से मैदान में, केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की नींव रखी। यह संगठन, जो आज भारत के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, उस दिन केवल 17 लोगों के छोटे समूह से शुरू हुआ था। लेकिन हेडगेवार का सपना छोटा नहीं था—उनका लक्ष्य था हिंदू समाज को संगठित करना और भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करना। आइए, उस ऐतिहासिक दिन की कहानी को करीब से जानें।

हेडगेवार का संकल्प: हिंदू समाज की एकता

1920 के दशक में भारत स्वतंत्रता संग्राम के उफान पर था। कांग्रेस के नेतृत्व में आंदोलन चल रहे थे, लेकिन हेडगेवार का मानना था कि केवल राजनीतिक आजादी काफी नहीं है। वे हिंदू समाज में व्याप्त असंगठन और कमजोरी को देखकर चिंतित थे। उनके विचार में, विदेशी शासन से पहले समाज को अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करना होगा। यह विचार उनके क्रांतिकारी दिनों और कांग्रेस में काम करने के अनुभवों से उपजा था। कोलकाता में मेडिकल पढ़ाई के दौरान अनुशीलन समिति के संपर्क में आने से उनकी सोच और गहरी हुई थी। लेकिन हेडगेवार ने बंदूक या हिंसा का रास्ता नहीं चुना—उन्होंने एक संगठन बनाने का फैसला किया, जो चरित्र निर्माण और अनुशासन के जरिए समाज को जोड़े।

विजयादशमी का प्रतीकात्मक महत्व

हेडगेवार ने आरएसएस की स्थापना के लिए विजयादशमी का दिन क्यों चुना? यह कोई संयोग नहीं था। हिंदू परंपरा में विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। हेडगेवार इसे एक शुभ संकेत के रूप में देखते थे—एक नई शुरुआत, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाएगी। नागपुर में उनके घर के पास मोहिते वाडा नामक जगह पर पहली शाखा शुरू हुई। उस दिन हेडगेवार के साथ कुछ गिने-चुने लोग थे, जिनमें बाबूराव ठाकरे और भाऊजी कावरे जैसे समर्पित साथी शामिल थे। यह सभा भव्य नहीं थी, लेकिन इसके पीछे का विचार विशाल था।

पहली शाखा: सादगी से शुरूआत

पहली शाखा में क्या हुआ? कोई बड़ा भाषण या समारोह नहीं था। हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को एकत्र किया और उन्हें शारीरिक व्यायाम, अनुशासन और देशभक्ति की शिक्षा दी। उनका मानना था कि मजबूत शरीर और मजबूत मन ही समाज की रीढ़ बन सकता है। उस दिन से “शाखा” की अवधारणा शुरू हुई—एक ऐसी जगह, जहाँ लोग रोज़ाना मिलते, विचार साझा करते और संगठित होते। हेडगेवार ने इसे सैन्य प्रशिक्षण से प्रेरित किया, लेकिन इसका उद्देश्य युद्ध नहीं, बल्कि आत्म-सुधार और समाज सेवा था।

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चुनौतियाँ और शुरुआती संघर्ष

आरएसएस की शुरुआत आसान नहीं थी। 1925 में भारत में राजनीतिक उथल-पुथल थी। अंग्रेजी सरकार की नज़र हर नए संगठन पर थी, और हिंदू-मुस्लिम तनाव भी बढ़ रहा था। हेडगेवार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा—कुछ ने उन पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाया, तो कुछ ने उनकी गैर-राजनीतिक रणनीति को समझा ही नहीं। लेकिन हेडगेवार अडिग रहे। उन्होंने कहा, “मेरा लक्ष्य समाज को जागृत करना है, न कि सत्ता हासिल करना।” पहले कुछ सालों में आरएसएस धीरे-धीरे बढ़ा, लेकिन हेडगेवार की मेहनत ने इसे मजबूत नींव दी।

हेडगेवार की दूरदर्शिता

हेडगेवार जानते थे कि उनका सपना उनके जीवनकाल में पूरा नहीं होगा। फिर भी, उन्होंने बीज बोया। 1940 में उनकी मृत्यु तक आरएसएस कई शहरों में फैल चुका था। उनकी मृत्यु के बाद, माधव सदाशिव गोलवलकर ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन नींव हेडगेवार की ही थी। आज जब हम आरएसएस को लाखों स्वयंसेवकों के साथ देखते हैं, तो उस विजयादशमी के दिन की महत्ता समझ में आती है।

आज के लिए प्रेरणा

विजयादशमी 1925 की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक सबक है। हेडगेवार ने दिखाया कि छोटी शुरुआत से भी बड़े बदलाव संभव हैं। उनका जोर अनुशासन, एकता और निस्वार्थ सेवा पर था—ऐसे मूल्य, जो आज भी प्रासंगिक हैं। चाहे आप उनकी विचारधारा से सहमत हों या नहीं, यह मानना पड़ेगा कि एक व्यक्ति के संकल्प ने भारत के सामाजिक ढांचे को प्रभावित किया।

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