BY: Yoganand Shrivastva
Diwali Gambling Tradition दीपावली का त्योहार रोशनी, खुशियों और मां लक्ष्मी की आराधना के लिए जाना जाता है। लेकिन इस पर्व से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी है, जो हर साल चर्चा में रहती है। कई घरों में लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद ताश खेलने और शगुन के नाम पर दांव लगाने का चलन है। आखिर दिवाली की रात जुआ खेलने की यह परंपरा कहां से शुरू हुई और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यता है?
इस परंपरा को भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी एक पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसके वास्तविक आरंभ का कोई एक निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। धार्मिक ग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं में पासों के खेल का उल्लेख जरूर मिलता है।
शिव-पार्वती के चौपड़ खेलने की कथा से जुड़ी है मान्यता
Diwali Gambling Tradition लोकमान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने चौपड़ का खेल खेला। इस खेल में माता पार्वती ने भगवान शिव को पराजित कर दिया। इसी प्रसंग को दिवाली पर जुआ खेलने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा था कि दीपावली की रात जो व्यक्ति चौपड़ या पासों का खेल खेलेगा, उसके लिए आने वाला वर्ष शुभ और समृद्धिशाली रहेगा। इसी विश्वास के चलते कुछ परिवारों में दिवाली की रात ताश खेलने को शगुन माना जाता है।
हालांकि, इस कथा के अलग-अलग संस्करण प्रचलित हैं। इसे ऐतिहासिक घटना के बजाय पौराणिक और लोकपरंपरा के रूप में समझना चाहिए।
प्राचीन समय में चौपड़ और पासों का था चलन
Diwali Gambling Tradition दिवाली पर जुआ खेलने की परंपरा केवल आधुनिक ताश के खेल तक सीमित नहीं रही है। पुराने समय में चौपड़ और पासों के जरिए खेल खेले जाते थे। सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े अध्ययनों में भी दीपावली के आसपास पासों और द्यूतक्रीड़ा का उल्लेख मिलता है।
सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़ी संस्था सहपीडिया के अनुसार, प्राचीन साहित्य में ‘यक्षरात्रि’ नामक उत्सव का उल्लेख मिलता है, जिसमें दीप जलाने और पासे खेलने जैसी गतिविधियों का वर्णन किया गया है। कुछ विद्वान इस उत्सव को दीपावली की पुरानी परंपराओं से जोड़कर देखते हैं।
इसके अलावा, ब्रह्म पुराण में शिव और पार्वती के पासे खेलने से जुड़ा प्रसंग मिलता है। एलोरा की गुफाओं में भी शिव-पार्वती को पासों का खेल खेलते हुए दर्शाने वाली शिल्पकृतियां मौजूद हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में पासों के खेल का संबंध काफी पुराना है।
शगुन के नाम पर जुआ खेलना जरूरी नहीं
Diwali Gambling Tradition समय के साथ चौपड़ और पासों की जगह ताश के पत्तों ने ले ली। आज कई जगह दिवाली की रात तीन पत्ती, रमी और दूसरे कार्ड गेम खेले जाते हैं। कुछ लोग इसे केवल मनोरंजन और शगुन तक सीमित रखते हैं, जबकि कई जगह पैसे लगाकर भी खेला जाता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि दिवाली पर जुआ खेलना कोई अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं है। मां लक्ष्मी की पूजा का उद्देश्य सुख, शांति और समृद्धि की कामना करना है। जुए में बड़ी रकम लगाना आर्थिक नुकसान और पारिवारिक विवाद का कारण बन सकता है।
इसलिए दिवाली की खुशियों को बनाए रखने के लिए त्योहार को पूजा, परिवार के साथ समय बिताने और आपसी प्रेम के साथ मनाना ही बेहतर है।


