BY
Yoganand Shrivastava
Aajadi 14 और 15 अगस्त 1947 की वह मध्यरात्रि भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम और युगांतरकारी क्षण था। करीब दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन, अनगिनत बलिदानों और लंबे अहिंसक व सशस्त्र संघर्षों के बाद भारत ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सांस ली। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act, 1947) के तहत सत्ता का हस्तांतरण हुआ और लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय के रूप में इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के साक्षी बने।
Aajadi माउंटबेटन योजना से लेकर आज़ादी की तारीख तय होने तक का सफर
- 3 जून योजना (माउंटबेटन प्लान):द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो चुकी थी और भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के राजनीतिक दलों के सामने विभाजन और सत्ता हस्तांतरण का अंतिम ढांचा पेश किया, जिसे ‘माउंटबेटन योजना’ कहा गया। इसके तहत भारत और पाकिस्तान नाम के दो अलग डोमिनियन बनाने का फैसला हुआ।
- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947:माउंटबेटन योजना को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद ने जुलाई 1947 में ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ पारित किया। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता की आधिकारिक तिथि घोषित की गई और ब्रिटिश क्राउन का भारत पर आधिपत्य समाप्त कर दिया गया।
Aajadi ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny): वह ऐतिहासिक मध्यरात्रि
14 अगस्त की रात ठीक 12 बजे जैसे ही पूरी दुनिया सो रही थी, भारत में स्वतंत्रता का नया सवेरा हुआ। संसद के केंद्रीय कक्ष (संविधान सभा) में स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश को संबोधित करते हुए अपना ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसे “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” (Tryst with Destiny) के नाम से जाना जाता है।
“वर्षों पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब समय आ गया है जब हम अपने उस वादे को पूरी तरह से या काफी हद तक निभाएं। मध्यरात्रि के समय, जब पूरी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।”
— पंडित जवाहरलाल नेहरू
भाषण के तुरंत बाद संविधान सभा के सदस्यों ने देश की सेवा की शपथ ली और तिरंगे को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में आधिकारिक स्वीकृति दी गई।
Aajadi सत्ता का हस्तांतरण और विभाजन का दर्द
15 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने औपचारिक रूप से पंडित जवाहरलाल नेहरू को सत्ता सौंपी। माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने, जबकि नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला।
हालांकि, आज़ादी का यह जश्न पूरी तरह से उल्लासपूर्ण नहीं था। इसके साथ ही देश का विभाजन भी हुआ, जिसके कारण पंजाब और बंगाल के क्षेत्रों में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़के। लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा और अनगिनत निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस भयावह हिंसा को रोकने और शांति स्थापित करने के लिए उस समय बंगाल के नोआखली में अनशन पर थे और वे दिल्ली में आयोजित आज़ादी के किसी भी उत्सव में शामिल नहीं हुए थे।
एक नए युग की शुरुआत
विभाजन की विभीषिका के बावजूद, 15 अगस्त 1947 ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी। 200 साल की ब्रिटिश हुकूमत का अंत हुआ और भारत ने अपने सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाया। लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया गया, जो आज भी भारत की संप्रभुता, अखंडता और लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रतीक है।



