‘रेवड़ी कल्चर’ के रंग, किसके संग ?

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Colours of 'Rewadi Culture', with whom?

सरकारी खजाने का हश्र, चुनावी वादों का सच?

by: Vijay Nandan

एक व्यंगकार की ये लाइनें हैं…

रेवड़ी मुस्कराई

सधे कदमों से पास आई

एक बड़कू भैया चिल्लावत रहे,

मुफ्त रेवड़ी सभ्यता पर बतावत रहे,

रेवड़ी सभ्यता वर्तमान युग को चबा जाएगी,

या फिर कर्ज और सूद तले दबा जाएगी..

आप समझ गए होंगे आज का हमारा विषय क्या है..चलिए नहीं समझे..तो बता देते हैं..देश की चुनावी राजनीति में ‘रेवड़ी सभ्यता बनती जा रही है….हम सभ्यता शब्द इसलिए उपयोग कर रहे हैं क्योंकि रेवड़ी कल्चर एक के बाद एक चुनाव में बढ़ता जा रहा है..क्योंकि हमें देश की फिक्र है..स्वदेश न्यूज का ध्येय वाक्य भी है..सबसे पहले देश..इस मुद्दे पर चर्चा शुरू करने से पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में रेवड़ी कल्चर की होड़ पर ये खास रिपोर्ट देख नीचे यूट्यूब लिंक पर रेवड़ी सभ्यता पर राजनीतिक बहस भी देखिए…

स्वदेश न्यूज के सवाल

रेवड़ी कल्चर’ के रंग, किसके संग?
रेवड़ी कल्चर चुनावी जीत का सौदा ?
या सरकारी खजाने की लूट?
चुनावी रेवड़ियां बनाम आर्थिक स्थिरता ?
मुफ्त योजनाएं, लोकतंत्र का उपहार ?

चुनावी रेवड़ियां देश पर बोझ?
सरकारी खजाने का हश्र, चुनावी वादों का सच?
रेवड़ी राजनीति से जीत तो मिलेगी, पर देश का क्या?

फ्रीबीज..यानि मुफ्त की रेवड़ी के राजनीतिक वायरस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को भीअपनी जद में ले लिया है। दिल्ली में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी के बाद बीजेपी ने भी जनता को लुभाने मुफ्त की रेवड़ी बांटने का ऐलान कर दिया है। सवाल ये है कि देश की राजधानी की प्रति व्यक्ति आय देश में तीसरे स्थान पर है, जबकि बेरोजगारी में सबसे कम दर वाले राज्यों में दिल्ली शुमार है…फिर क्यों जनता को मुफ्त की रेवड़ी की जरूरत है? अर्थशास्त्रियों, कानूनविदों की माने तो फ्रीबीज चुनाव में जीत की गारंटी बन गई है, इसके सबसे बड़े उदाहरण दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड. महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ हैं.. इन राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों को मुफ्त की योजनाओं ने प्रभावित किया था. जैसे लाड़ली बहना योजना मध्य प्रदेश में चल निकली..उसके बाद जितने भी राज्यों में चुनाव हुए सभी ने इस योजना को जीत की गारंटी की तरह भुनाया। बाकी राज्यों की तरह बीजेपी ने भी दिल्ली के अपने घोषणा पत्र में महिला समृद्धि योजना समेत की मुफ्त की योजनाओं का दांव खेला है..

जेपी नड्डा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बीजेपी ने जारी किया संकल्प पत्र

बीजेपी के संकल्प पत्र के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली के चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त की रेवड़ी बांटने की होड़ सी लग गई है. आइए एक नजर डाल लेते हैं होड़ की इस दौड़ पर…

रेवड़ी कल्चर’ के रंग, किसके संग?
चुनावी जीत की गारंटी बना फ्रीबीज
दिल्ली में फ्रीबीज देने की लगी होड़
कर्ज के बोझ तले दब नहीं रहा देश ?


हाल ही में बीजेपी ने दिल्ली का अपना घोषण पत्र जारी किया (gfx in)जिसमें महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए देने, गरीब महिलाओं को सिलेंडर पर 500 रुपए की सब्सिडी, और होली दिवाली पर एक-एक सिलेंडर मुफ्त देने, गर्भवती महिलाओं को 2100 रु देने., फ्री बस जैसे वादे किए हैं। कांग्रेस पहले ही दिल्ली की महिलाओं को 2500 रु. महीना देने की गारंटी दे चुकी है. उधर आम आदमी पार्टी ने महिलाओं को हर महीने 2100 रु, और फ्री बस सेवा देने का वादा किया है। (gfx out)

दिल्ली में मुफ्त की रेवड़ी की होड़
बीजेपी- महिलाएं 2500 रु. माह, गैस सिलेंडर 500 रु.

कांग्रेस- महिलाओं को 2500 रु. महीना

आप- महिलाओं को 2100 रु. महीना, सब्सिडी फ्री बस सेवा


बात करें बुजुर्गों की तो बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में वादा किया है कि (gfx in)वो बुजुर्गों को हर महीने 2500 रु. पेंशन के रूप में देगी, 70 साल के बुजुर्ग और दिव्यांगों को 3000 रु. देगी। कांग्रेस ने बुजुर्गों के लिए कोई बड़ी घोषणा नहीं है, लेकिन आप ने हर महीने 2500 रु. पेंशन देने और फ्री तीर्थ यात्रा कराने का वादा किया है।

दिल्ली में मुफ्त की रेवड़ी की होड़
बीजेपी- बुजुर्गों को 2500 रु, माह, 70 वर्ष सेऊपर/ दिव्यांग
3000 रु. महीना

कांग्रेस- कोई घोषणा नहीं

आप- 2500 रु. पेंशन, फ्री तीर्थ यात्रा


चुनाव में छात्रों को लुभाने बीजेपी ने कोई बड़ी घोषणा नहीं की है, उधर कांग्रेस ने युवाओं को हर महीना 8500 रु, अप्रेंटिसशिप के रूप में देने का वादा किया है। आम आदमी पार्टी ने छात्रों को फ्री शिक्षा, बस सेवा फ्री, मेट्रो में 50 फीसदी रियायत देने का एलान किया है।

दिल्ली में मुफ्त की रेवड़ी की होड़
बीजेपी-युवा कोई बड़ी घोषणा नहीं

कांग्रेस- 8500 रु. महीना

आप- फ्री शिक्षा, फ्री बस सेवा
घोषणा नहीं मेट्रो 50% रियायत

इसके अलावा भी बिजली पानी, फ्री देने और आटो चालको की बेटी पर एक लाख रुपए देने का आप पार्टी ने वादा किया है. सवाल ये है कि ये आर्थिक बोझ किस पर जाता है, सवाल है देश के कर दाताओं पर.. दरअसल आर्थिक नजरिए से देखा जाए तो हमारे देश में वोटर तीन स्तरों का है- उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग या गरीब. लेकिन महंगाई, टैक्स, बेरोजगारी की जद्दोजहद और सुविधाओं को जुटाने की कवायद सबसे ज्यादा मध्यम वर्ग को झेलनी पड़ती है. इसके गलत और सही होने का फैसला या परिभाषित करने का हल सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले से निकल आएगा, लेकिन आंकड़ों की हकीकत ये सवाल उठाती है कि देश की राजधानी में रहने वाली जनता सक्षम है तो उसे फ्रीबीज की क्या जरूरत है. राजनीतिक दल फ्रीबीज के बजाय समग्र विकास पर गौर क्यों नहीं करना चाहते? या फिर मुफ्त की योजनाओं की एक परिधि तय क्यों नहीं कर ली जाती। सवाल ये है कि कोई भी सरकार आ बैल मुझे मार वाली कहावत सिद्ध क्यों करना चाहेगी। जब हर पांच साल में उन्हें चुनाव जीतना है।

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