BY: MOHIT JAIN
लखनऊ से बड़ी खबर सामने आई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने जातिगत भेदभाव खत्म करने की दिशा में एक अहम पहल की है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं। इसके तहत अब पुलिस रिकॉर्ड्स और सार्वजनिक स्थलों पर जाति का उल्लेख पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।
अब एफआईआर और गिरफ्तारी मेमो में नहीं दिखेगी जाति
नए आदेश के मुताबिक:
- एफआईआर (FIR)
- गिरफ्तारी मेमो
- अन्य पुलिस रिकॉर्ड्स
में अब किसी भी आरोपी या पीड़ित की जाति का उल्लेख नहीं होगा। इसके स्थान पर माता-पिता के नाम जोड़े जाएंगे।
यह कदम न केवल प्रशासनिक बदलाव है, बल्कि समाज में जातिगत पहचान के आधार पर होने वाले भेदभाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
सार्वजनिक स्थलों पर भी जाति आधारित संकेत हटेंगे

आदेश के अनुसार, थानों के नोटिस बोर्ड, पुलिस वाहनों और साइनबोर्ड्स से जाति संबंधित नारे और संकेत भी हटाए जाएंगे। साथ ही, जाति आधारित रैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएगा और सोशल मीडिया पर भी सख्त निगरानी रखी जाएगी।
SC/ST एक्ट मामलों में मिलेगी छूट
हालांकि, SC/ST एक्ट जैसे संवेदनशील मामलों में जाति का उल्लेख करने की छूट बनी रहेगी। इसके अलावा, आदेश के सही तरीके से पालन के लिए SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) और पुलिस नियमावली में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे।
क्यों अहम है यह फैसला?
भारत में लंबे समय से जातिगत भेदभाव सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करता रहा है। उत्तर प्रदेश का यह कदम न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ाएगा बल्कि सामाजिक समानता की दिशा में भी एक मजबूत संदेश देगा।
यूपी सरकार का यह फैसला समाज में जातिगत भेदभाव खत्म करने की दिशा में ऐतिहासिक और दूरगामी असर डालने वाला कदम साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस आदेश का पालन किस हद तक सख्ती से कराया जाता है।





