संस्कृत पढ़ाई का विवाद: सांस्कृतिक धरोहर या अनावश्यक बोझ?

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संस्कृत पढ़ाई का विवाद: सांस्कृतिक धरोहर या अनावश्यक बोझ?

एक रेडिट यूजर ने हाल ही में स्कूलों में संस्कृत पढ़ाए जाने पर सवाल उठाकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। अपने पोस्ट का शीर्षक “दुनिया में संस्कृत अब भी स्कूलों में क्यों पढ़ाई जाती है?” रखते हुए यूजर ने तर्क दिया कि यह भाषा, जो अब रोजमर्रा की जिंदगी में बोली नहीं जाती, छात्रों के लिए अनावश्यक बोझ बन गई है। यूजर ने लिखा, “संस्कृत को अब कोई नहीं बोलता। यह व्यावहारिक रूप से एक विलुप्त भाषा है।”

संस्कृत पढ़ाई का विवाद: सांस्कृतिक धरोहर या अनावश्यक बोझ?

संस्कृत की प्रासंगिकता पर सवाल

पोस्टर ने संस्कृत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को तो स्वीकार किया, लेकिन इसे कई स्कूलों में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाए जाने पर आपत्ति जताई। उनका कहना था, “घंटों तक संस्कृत पढ़ाई जाती है, जबकि शिक्षक भी इसे धारा प्रवाह नहीं बोल पाते। अगर वे बोल भी लें, तो क्या फायदा? इसका क्या उद्देश्य है?” यूजर ने यह भी कहा कि संस्कृत की पढ़ाई अक्सर रटने पर आधारित होती है, जिससे सही मायने में सीखना नहीं हो पाता। “मैंने पांच साल तक संस्कृत पढ़ी, लेकिन मुझे एक भी शब्द याद नहीं,” उन्होंने बताया, साथ ही यह भी जोड़ा कि ज्यादातर छात्र परीक्षा पास करने के बाद इसे भूल जाते हैं।

सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया

इस पोस्ट पर लोगों की प्रतिक्रियाएं तेजी से आईं और राय दो धड़ों में बंट गई। कुछ ने यूजर के तर्क का समर्थन किया, तो कुछ ने संस्कृत को पाठ्यक्रम में शामिल करने का बचाव किया। एक यूजर ने बताया कि संस्कृत को अनिवार्य बनाना ज्यादातर उत्तरी भारत की स्कूलों की नीति है। उन्होंने कहा, “यह इसलिए होता है क्योंकि संस्कृत के लिए अच्छा पाठ्यक्रम और शिक्षक आसानी से उपलब्ध हैं। फ्रेंच या स्पैनिश जैसे विषयों के मुकाबले संस्कृत शिक्षक सस्ते और आसानी से मिल जाते हैं।”

दूसरे यूजर ने संस्कृत पढ़ने का एक व्यावहारिक फायदा बताया। उनका कहना था, “छात्र इसे इसलिए चुनते हैं क्योंकि इसमें 100 में से 100 अंक लाना आसान है। लोग ज्यादा अंक के लिए कुछ भी पढ़ लेंगे।” वहीं, कुछ लोगों ने इसकी अकादमिक उपयोगिता पर जोर दिया। एक कमेंट में लिखा था, “अगर आप इतिहासकार, भाषाविद् या धर्मशास्त्री बनना चाहते हैं, तो संस्कृत पढ़ना जरूरी है।”

यूजर का जवाब और बढ़ता विवाद

मूल पोस्टर इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने लिखा, “जो बच्चे पहले ही पढ़ाई के बोझ से परेशान हैं, उन पर इस मृतप्राय भाषा को क्यों थोपा जाए? इस तरह पढ़ाने से संस्कृत का पुनर्जनन तो होने से रहा।” विवाद तब और बढ़ गया, जब यूजर ने बताया कि उन्हें व्यक्तिगत अपशब्द और “घृणित संदेश” मिले। “आप लोग मुझ पर भेड़ियों की तरह टूट पड़े हैं,” उन्होंने लिखा और आलोचकों से तर्कसंगत बहस करने की अपील की।

क्या कहता है यह विवाद?

यह बहस एक बड़े सवाल को जन्म देती है- क्या आधुनिक शिक्षा में संस्कृत जैसे विषयों का स्थान है, या हमें पाठ्यक्रम को समय के साथ बदलते हुए प्रासंगिक बनाना चाहिए? कुछ इसे सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ इसे पुरानी परंपरा का बोझ। आप क्या सोचते हैं? अपनी राय हमें जरूर बताएं।

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