राजद (RJD) के दो सांसद – डॉ. मनोज कुमार झा और फैज़ अहमद – ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसमें वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025 को संविधान विरोधी बताया गया है। उनका कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों का उल्लंघन करता है।
❓ क्या है पूरा मामला?
सांसदों का कहना है कि नया संशोधन:
- मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों (वक़्फ़) की स्वतंत्रता को कमजोर करता है
- सरकार को वक़्फ़ संपत्तियों में हस्तक्षेप का अधिकार देता है
- “वक़्फ़ बाय यूज़र” यानी लंबे समय से इस्तेमाल में आ रही धार्मिक संपत्ति को वक़्फ़ मानने की परंपरा को खत्म कर देता है
- वक़्फ़ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति की अनुमति देता है
- वक़्फ़ घोषित करने के लिए पांच साल की धार्मिक प्रथा और दस्तावेजों की अनिवार्यता लाता है
- सरकार को किसी भी संपत्ति की वक़्फ़ स्थिति हटाने का अधिकार देता है
- वक़्फ़ संपत्तियों पर आपत्ति दर्ज कराने की समय सीमा (2 साल) खत्म कर देता है, जिससे अनिश्चितकालीन विवाद हो सकते हैं
📘 “वक़्फ़ बाय यूज़र” क्या होता है?
पहले यदि कोई संपत्ति वर्षों से मुस्लिम समुदाय के धार्मिक या सामाजिक उपयोग में थी, तो उसे औपचारिक दस्तावेजों के बिना भी वक़्फ़ माना जाता था। यह परंपरा अब इस संशोधन के बाद समाप्त हो सकती है, जिससे कई पुरानी मस्जिदें, दरगाहें और कब्रिस्तान खतरे में पड़ सकते हैं।

⚖️ कानूनी आधार पर चुनौती
याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन संविधान के कई अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है, जैसे:
- अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 15: धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा
- अनुच्छेद 21: जीवन और गरिमा का अधिकार
- अनुच्छेद 25 और 26: धार्मिक स्वतंत्रता और अपने धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार
- अनुच्छेद 29 और 30: अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और संस्थान चलाने का अधिकार
- अनुच्छेद 300A: संपत्ति का अधिकार
साथ ही यह कानून सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों, जैसे अयोध्या मामले (M. Siddiq v. Mahant Suresh Das) के भी खिलाफ है, जिसमें “वक़्फ़ बाय यूज़र” को मान्यता दी गई थी।
⚠️ क्यों है यह मामला अहम?
सांसदों का आरोप है कि यह कानून विशेष रूप से मुस्लिम वक़्फ़ संपत्तियों को निशाना बनाता है, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों की संपत्तियों को इससे छूट दी गई है। इससे:
- ऐतिहासिक संपत्तियाँ छीनी जा सकती हैं
- समुदायों के बीच टकराव और विवाद बढ़ सकते हैं
- धार्मिक आज़ादी और स्वशासन पर चोट पहुंच सकती है
🧾 याचिका में उठाए गए अन्य मुद्दे:
- जो अनुसूचित जनजाति (ST) के लोग इस्लाम अपनाते हैं, उन्हें वक़्फ़ बनाने से रोका गया है
- वक़्फ़ बोर्ड और काउंसिल में अब गैर-मुस्लिम सदस्य हो सकते हैं
- वक़्फ़ बोर्ड के CEO के लिए मुस्लिम होना जरूरी नहीं रहा
- सरकार को अधिकार है कि वह वक़्फ़ समुदाय के फैसलों को पलट सकती है
🔚 निष्कर्ष
राजद सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह वक़्फ़ संशोधन अधिनियम 2025 को असंवैधानिक घोषित करे, क्योंकि यह संविधान की मूल संरचना और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन करता है। उनका कहना है कि यह कानून वक़्फ़ बोर्डों को सरकारी नियंत्रण में डाल देता है, जो अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान पर सीधा हमला है।
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