Raisen 30 january:भक्ति का रस और त्याग की पराकाष्ठा: जगतगुरु राम दिनेशाचार्य महाराज का दिव्य संदेश

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Report: Ram Yadav

Raisen (सिलवानी): भक्ति जब हृदय में उतरती है, तो वह केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन जीने का आधार बन जाती है। रायसेन जिले के ग्राम साईंखेड़ा में आयोजित 11 कुंडीय विराट यज्ञ और रामकथा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जगतगुरु राम दिनेशाचार्य महाराज ने आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना का शंखनाद किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस मनुष्य को एक बार ईश्वरीय भक्ति का रस मिल जाता है, उसके लिए संसार के तमाम भौतिक सुख और विषय-भोग फीके पड़ जाते हैं।

राम-भरत मिलाप: सच्चा प्रेम और त्याग का आदर्श

Raisen महाराज ने रामकथा के माध्यम से वर्तमान समाज में गिरते नैतिक मूल्यों पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जहाँ स्वार्थ के वशीभूत होकर भाई-भाई के बीच दूरियां बढ़ रही हैं, वहीं भगवान राम और भरत का प्रेम त्याग की सर्वोच्च मिसाल है। महाराज ने कहा कि भगवान राम कभी भरत की बात नहीं टालते, क्योंकि उनका प्रेम निष्काम और पवित्र है। उन्होंने युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि आज वासना को प्रेम का मुखौटा पहना दिया गया है, जबकि वास्तव में प्रेम वह है जिसमें मर्यादा, समर्पण और त्याग समाहित हो। भरत का यह भाव कि “मैं केवल आपका सेवक हूँ”, भक्ति की उस ऊंचाई को दर्शाता है जहाँ अहंकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

भक्ति का रस और सनातन संस्कारों की आवश्यकता

Raisen शास्त्रों का प्रमाण देते हुए जगतगुरु ने बताया कि संसार की हर वस्तु में कोई न कोई विधान और रस होता है, लेकिन ‘भक्ति रस’ सर्वोपरि है। भगवान शिव के वचनों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि राम नाम में वह मिठास है जो जीवन के समस्त दुखों को हर लेती है। महाराज ने इस बात पर चिंता जताई कि संस्कारवान सनातन मार्ग होने के बावजूद आज समाज दिशाहीन प्रतीत हो रहा है। उन्होंने श्रीरामचरितमानस को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन सुधारने की औषधि बताया। उनके अनुसार, सनातन धर्म की मजबूती के लिए परिवारों में संवाद और भाईचारे का होना अनिवार्य है।

सामाजिक न्याय, शिक्षा और समसामयिक विषयों पर दो टूक

Raisen धर्म के साथ-साथ महाराज ने ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने बेटियों की शिक्षा को अनिवार्य बताते हुए कहा कि शिक्षा का अधिकार हर बेटी को मिलना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक संवेदनाओं और माता-पिता के मान-सम्मान का ध्यान रखना भी संतान का धर्म है। यूजीसी एक्ट (UGC Act) और जातिगत विभाजन पर चर्चा करते हुए उन्होंने सरकार को नसीहत दी कि समाज को बांटने वाली नीतियों पर पुनर्विचार आवश्यक है। उन्होंने सवर्णों के हितों की रक्षा और सामाजिक समरसता पर जोर देते हुए कहा कि संवाद ही वह सेतु है जो राष्ट्र को प्रगति की ओर ले जा सकता है।

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