Bhopal मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश सरकार वन्य और जलीय जीवों के संरक्षण के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को संतुलित करने के लिए प्रतिबद्ध है। विशेष रूप से चंबल नदी में संरक्षित दुर्लभ प्रजातियों के कछुए अब नमामि गंगे मिशन के तहत गंगा नदी की स्वच्छता और पुनर्जीवन के ‘प्राकृतिक सफाई-योद्धा’ बनकर उभरे हैं।
Bhopal गंगा के पुनर्जीवन में कछुओं की ‘विशेष’ भूमिका
विशेषज्ञों के अनुसार, कछुए नदी के ऐसे ‘प्राकृतिक स्वीपर’ हैं जो मशीनों से भी बेहतर सफाई करते हैं।
- जैविक कचरे का निपटान: ये कछुए नदी में मौजूद सड़े-गले जैविक पदार्थों और मृत अवशेषों को खाकर पानी को प्रदूषित होने से बचाते हैं।
- बटागुर (रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल): चंबल से भेजे गए ये दुर्लभ कछुए मांसाहारी प्रकृति के होने के कारण जलीय तंत्र में संतुलन बनाए रखते हैं।
- हैदरपुर वेटलैंड: 26 अप्रैल 2025 को चंबल से 20 दुर्लभ ‘बटागुर कछुए’ उत्तर प्रदेश के हैदरपुर वेटलैंड और गंगा की मुख्य धारा में छोड़े गए थे, जिनके उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।
Bhopal गंगा की स्वच्छता पर दिखा सकारात्मक प्रभाव
आंकड़ों के अनुसार, इन जलीय योद्धाओं की मौजूदगी से गंगा के विभिन्न घाटों पर पानी की गुणवत्ता (Water Quality) में सुधार दर्ज किया गया है:
- वाराणसी (अस्सी घाट): फीकल कोलीफॉर्म (FC) का स्तर 2014 में 2500 MPN/100mL था, जो 2025 में घटकर 790 रह गया है।
- पटना (गांधी घाट): यहाँ भी प्रदूषण स्तर 5400 से घटकर 2200 पर आ गया है।
- ऑक्सीजन स्तर: गंगा के अधिकांश हिस्सों में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO) का स्तर अब 5.0 mg/l से अधिक है, जो जलीय जीवन के लिए अत्यंत अनुकूल है।
Bhopal चंबल: कछुओं की नौ दुर्लभ प्रजातियों का घर
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य कछुओं के संरक्षण का प्रमुख केंद्र है। यहाँ कछुओं की नौ दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं:
- नदी के स्वीपर: बटागुर और बटागुर डोंगोका।
- अन्य प्रजातियां: साल कछुआ, धमोक, चौड़, मोरपंखी, कटहेवा, पचेड़ा और इंडियन स्टार कछुआ।
मुख्यमंत्री का संदेश:
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आहवान किया कि “प्रकृति और वन्यजीवों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।” उन्होंने कहा कि कछुओं का विमुक्तिकरण और चीता पुनर्वास जैसे कदम मध्यप्रदेश को वन्य-जीव पर्यटन और संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करेंगे।





