
Pramod Shrivastav Editorial Head
Census 2027 : देश में कल से बहुप्रतीक्षित जनगणना प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। लंबे अंतराल के बाद होने वाली यह जनगणना सिर्फ आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति और नीतियों की दिशा तय करने वाली बड़ी कवायद मानी जा रही है। जनगणना के जरिए देश की आबादी, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और संसाधनों की वास्तविक तस्वीर सामने आती है। यही डेटा केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं, बजट आवंटन और विकास नीतियों की नींव बनता है। लेकिन इस बार जनगणना कई कारणों से राजनीतिक बहस के केंद्र में है। विपक्ष लगातार जातिगत जनगणना की मांग कर रहा है, जबकि सरकार अब तक इस पर स्पष्ट रुख नहीं ले पाई है।
इससे सामाजिक न्याय बनाम राजनीतिक समीकरण की बहस तेज हो गई है। जनगणना के आंकड़े भविष्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण का आधार बनेंगे। दक्षिण और उत्तर भारत के बीच सीटों के संतुलन को लेकर पहले से ही राजनीतिक चिंता मौजूद है। कुछ विपक्षी दलों को आशंका है कि जनगणना के डेटा का इस्तेमाल भविष्य में नागरिकता सत्यापन याने NRC के लिए किया जा सकता है, जबकि सरकार इसे खारिज करती रही है। सरकार इसे पूरी तरह प्रशासनिक और विकास आधारित प्रक्रिया बता रही है, जिसका उद्देश्य सटीक डेटा जुटाना है। लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होने वाली कवायद बता रहा है और पारदर्शिता व जातीय आंकड़ों की मांग कर रहा है।

ऐसे में जनगणना आने वाले चुनावों, सामाजिक समीकरणों और संसाधनों के बंटवारे पर गहरा असर डाल सकती है। जैसे-जैसे आंकड़े सामने आएंगे, वैसे-वैसे सियासी तापमान और बढ़ने की संभावना है। जाहिर है जनगणना एक प्रशासनिक प्रक्रिया जरूर है, लेकिन भारत जैसे विविधता वाले देश में यह सीधे-सीधे राजनीति, सत्ता संतुलन और सामाजिक न्याय से जुड़ जाती है। जो आने वाले वक्त में राजनीति में बहस का मुद्दा जरूर बनेगा।।।इसी विषय पर हम चर्चा करेंगे लेकिन पहले ये रिपोर्ट देख लेते हैं।।
JCensus 2027 : डिजिटल जनगणना की शुरुआत, बदलेगा प्रतिनिधित्व का अनुपात
देश में 1 अप्रैल से पहली बार डिजिटल जनगणना का काम शुरू हो रहा है, जो दो चरणों में होगा। पहले चरण में 1 अप्रैल से 30 सितंबर तक मकानों की सूचीकरण और स्व-गणना होगी।इसमें 33 प्रश्नों के साथ डिजिटल पोर्टल पर नागरिकों को खुद जानकारी भरने का विकल्प दिया गया है।
इसमें भारत के इतिहास में पहली बार, देश भर के नागरिक जनगणना अधिकारी के अपने दरवाजे पर आने का इंतजार किए बिना, अपने घर से संबंधित डेटा को खुद से ऑनलाइन जमा कर सकेंगे। लोगों को 15 दिनों के भीतर कई अहम जानकारी देनी होगी। ऐसे में सरकार ने भी अपनी तैयारी पूरी कर ली है। दरअसल, जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसे टाल दिया गया था। यह अब 2027 में पूरी होगी। जनगणना के कुछ खास बिंदुओं की बात करें तो इसमें
Census 2027 : पहला चरण (1 अप्रैल – 30 सितंबर 2026)
• मकान सूचीकरण और स्व-गणना, जिसमें इंटरनेट, LPG, और पानी जैसी सुविधाओं से जुड़े 33 सवाल पूछे जाएंगे।
दूसरा चरण (फरवरी 2027)
• मुख्य जनसंख्या गणना होगी, जिसमें व्यक्तिगत डेटा जैसे धर्म और जाति की जानकारी ली जाएगी।
डिजिटल प्रक्रिया एवं गोपनीयता
• स्व-गणना के लिए 16 भाषाओं में पोर्टल उपलब्ध होगा। डेटा पूरी तरह गोपनीय रहेगा।
समय सीमा
• विभिन्न राज्यों में 30 दिनों के भीतर यह प्रक्रिया पूरी की जाएगी, जैसे यूपी में 7 मई से 21 मई तक स्व-गणना होगी।
जनगणना सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि आने वाले दशक की राजनीति का ब्लूप्रिंट है। जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह सीधे तौर पर राजनीति की दिशा और दशा भी तय करती है।इसका असर कई स्तरों पर नजर आता है।बात परिसीमन की करें तो जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन होता है। जिसमें लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमा और संख्या का पुनर्निर्धारण होता है।1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का निर्धारण लंबे समय तक स्थिर रखा गया, अब जनगणना के बाद परिसीमन तय माना जा रहा है।
ऐसे में जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ेंगी या घटेंगी।इसका सीधा असर होगा कि राज्यों में प्रतिनिधित्व का अनुपात बदल सकता है। इससे संसद में ताकत का संतुलन भी बदलेगा। उधर जनगणना में जातिगत आंकड़े सामने आते हैं तो OBC, SC/ST आरक्षण की नई मांगें उठेंगी, राजनीतिक दल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के नए फार्मूले बनाएंगे। राज्यों के बीच तुलना होगी कि किस राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार बेहतर है।कौन सा राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल है। जनगणना से यह साफ होगा कि किस क्षेत्र में किस वर्ग की संख्या ज्यादा है। इसके साथ ही शहरी बनाम ग्रामीण वोटर का अनुपात के आधार पर पार्टियां टिकट वितरण और चुनावी रणनीति इन्हीं आंकड़ों पर तय करेंगी।
Census 2027 : वोट की नई रणनीति, महिला प्रतिनिधित्व पर असर
सरकारें जनगणना के आधार पर नई योजनाएं बनाएंगी, सब्सिडी और लाभार्थियों का दायरा तय करेंगी। इससे डायरेक्ट बेनिफिट पॉलिटिक्स और मजबूत होगी। यदि महिला जनसंख्या के आंकड़े नए रूप में आते हैं, तो 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के लागू होने से सियासी सीमकरण बदलेंगे। संसद और विधानसभाओं में जेंडर बैलेंस बदल सकता है। कई दल जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि सामाजिक न्याय की नई राजनीति को मजबूती मिल सके, सरकारी योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी यह डेटा अहम भूमिका निभाता है।
Census 2027 : नागरिक जनगणना, परिसीमन और राजनीति
साफ है कि जनगणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि वोट बैंक की रणनीति का आधार बन चुकी है। क्योंकि जनगणना से जनसंख्या, जाति, धर्म और सामाजिक स्थिति का डेटा सामने आता है। जनगणना और परिसीमन दोनों मिलकर राजनीतिक दलों की रणनीति को पूरी तरह बदल सकते हैं। सत्ता पक्ष इन प्रक्रियाओं को विकास और प्रतिनिधित्व सुधार से जोड़ता है तो वहीं विपक्ष इसे सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश के तौर पर देखता है। क्षेत्रीय दलों को डर है कि उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है। खासकर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ये मुद्दे राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकते हैं। लेकिन इससे पहले नागरिक जनगणना पर राजनीतिक दलों के अपने अपने तर्क हैं।
सीटों का बंटवारा, आरक्षण की बहस, विकास का मॉडल और वोट बैंक की रणनीति, सब कुछ जनगणना के आंकड़ों से तय होगा। साफ है, जनगणना 2026-27 के बाद भारत की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करेगी, जहां डेटा ही सत्ता की असली ताकत बनेगा। देश में नागरिक जनगणना और परिसीमन केवल प्रशासनिक प्रक्रियाएं नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर सत्ता के समीकरण तय करने वाले बड़े राजनीतिक औजार बन चुके हैं।
आने वाले वर्षों में इन दोनों मुद्दों का असर केंद्र से लेकर राज्यों तक की राजनीति पर साफ दिखाई देगा। बहरहाल अब नागरिक जनगणना और परिसीमन, दोनों ही लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके राजनीतिक हित भी उतने ही गहरे। डेटा का गणित और सीटों का भूगोल, मिलकर भारत की राजनीति का भविष्य तय करेंगे। यही वजह है कि इन मुद्दों पर बहस और सियासत दोनों तेज होती जा रही हैं।
Census 2027 : डिजिटल जनगणना की मुख्य विशेषताएं
दो चरणों में प्रक्रिया
- पहला चरण (1 अप्रैल – 30 सितंबर 2026) घर सूचीकरण और आवास गणना का है।
- दूसरा चरण फरवरी 2027 में होगा।
स्व-गणना (Self-Enumeration)
- नागरिक स्वयं वेब पोर्टल के माध्यम से अपनी और परिवार की जानकारी भर सकेंगे।
- 33 प्रश्न
जनगणना के दौरान 33 मुख्य सवाल पूछे जाएंगे।
- जातीय और विकलांगता डेटा
इस बार जनगणना में जाति और विकलांगता संबंधी आंकड़े भी एकत्र किए जाएंगे।
- जियो-टैगिंग
मकानों की जियो-टैगिंग की जाएगी, जिससे डेटा संग्रह अधिक सटीक होगा।
- कानूनी अनिवार्यता
सही जानकारी देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
गलत जानकारी देने या छिपाने पर 3 साल तक की सजा या जुर्माना।
देश में साल 2029 में लोकसभा चुनाव में परिसीमन का असर
भारत सरकार महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में जुटी
लोकसभा सीटों की संख्या हो सकती हैं 543 से बढ़कर 816
Census 2027 : किन बड़े राज्यों में बढ़ेंगी सीटें
उत्तर प्रदेश की मौजूदा 80 सीटें बढ़कर 120 हो सकती हैं (40 सीटों की वृद्धि)
महाराष्ट्र की मौजूदा 48 सीटें बढ़कर 72 हो सकती हैं (24 सीटों की वृद्धि)
पश्चिम बंगाल में मौजूदा 42 सीटें बढ़कर 63 हो सकती हैं (21 सीटों की वृद्धि)
बिहार में मौजूदा 40 सीटें बढ़कर 60 हो सकती हैं (20 सीटों की वृद्धि)
मध्य प्रदेश में 29 सीटें बढ़कर 44 हो सकती हैं. (15 सीटों की वृद्धि)
राजस्थान में 25 सीटें बढ़कर 38 सीटें होने की संभावना (13 सीटों की वृद्धि)
गुजरात में मौजूदा 26 सीटें बढ़कर 39 सीटें हो सकती हैं ( 13 सीटों की वृद्धि)
Census 2027 : मध्यम आकार के राज्यों को भी फायदा
ओडिशा की मौजूदा 21 सीटें बढ़कर 32 हो सकती हैं (11 सीटों की वृद्धि)
झारखंड की मौजूदा 14 सीटें बढ़कर 21 हो सकती हैं (7 सीटों की वृद्धि)
असम की मौजूदा 14 सीटें बढ़कर 21 हो सकती हैं (7 सीटों की वृद्धि)
पंजाब की मौजूदा 14 सीटें बढ़कर 21 हो सकती हैं (7 सीटों की वृद्धि)
छत्तीसगढ़ की मौजूदा 11 सीटें बढ़कर 17 हो सकती हैं (6 सीटों की वृद्धि)
हरियाणा की मौजूदा 10 सीटें बढ़कर 15 हो सकती हैं (5 सीटों की वृद्धि)
दिल्ली की मौजूदा 7 सीटें बढ़कर 11 हो सकती हैं (4 सीटों की वृद्धि)
जम्मू-कश्मीर की मौजूदा 5 सीटें बढ़कर 8 हो सकती हैं (3 सीटों की वृद्धि)
उत्तराखंड की मौजूदा 5 सीटें बढ़कर 8 हो सकती हैं (3 सीटों की वृद्धि)
अनुसूचित जाति (SC) के लिए 84 से 126 और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 47 से 70 सीटें प्रस्तावित।
Census 2027 : नॉर्थ ईस्ट राज्यों में बढ़ेगी सीटों की संख्या
छोटे राज्य और संघ क्षेत्रों में मामूली, लेकिन सुनिश्चित वृद्धि होगी।
हिमाचल प्रदेश की मौजूदा 4 सीटों में 2 की बढ़ोतरी होगी, जिसे सीटों की संख्या 6 हो जाएगी
वही गोवा में मौजूदा 2 सीटों में 1 सीट की बढ़ोतरी होगी, जिससे आंकड़ा 3 हो जाएगा
अरुणाचल प्रदेश की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)
सिक्किम की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)
मिजोरम की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)
मणिपुर की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)
त्रिपुरा की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)
मेघालय की मौजूदा 2 सीटें बढ़कर 3 हो सकती हैं (1 सीट की वृद्धि)





