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कालिदास समारोह में “अभिज्ञान शाकुंतलम्” का मंचन, कथक की लय पर जीवंत हुई शकुंतला-दुष्यंत की प्रेमकथा

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कालिदास समारोह में “अभिज्ञान शाकुंतलम्” का मंचन, कथक की लय पर जीवंत हुई शकुंतला-दुष्यंत की प्रेमकथा

Reporter: Vishal Dubey, Edit By: Mohit Jain

उज्जैन। महाकवि कालिदास की धरती उज्जैन में चल रहे कालिदास समारोह के मंच पर रविवार को साहित्य और नृत्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। भोपाल की प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना अमिता खरे ने अपनी सात शिष्याओं के साथ कालिदास की अमर कृति “अभिज्ञान शाकुंतलम्” का कथक नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन की कालजयी कथा

“काव्येषु नाटकं रम्यं, तत्र रम्या शकुंतला…”
महाकवि कालिदास के इस श्लोक को साकार करती यह प्रस्तुति राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रेम, विरह और पुनर्मिलन की कथा को भाव, संगीत और नृत्य की लय में पिरोकर पेश करती नजर आई।

अमिता खरे और शिष्याओं की सजीव प्रस्तुति

अमिता खरे के साथ मंच पर उनकी शिष्याएं अदिति सिंह रावत, दिशा विश्वकर्मा, रुनझुन श्रीवास्तव, कुशमीत कौर, अन्वी अग्रवाल, मृगी अग्रवाल और नयनशी उपाध्याय शामिल रहीं।
कोरियोग्राफी प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पद्मश्री शोवना नारायण की परंपरा से प्रेरित थी।

भाव, नृत्य और प्रतीकात्मकता का संगम

पूरी प्रस्तुति में कथा का प्रवाह वनवास में प्रेम से लेकर वियोग की वेदना और अंत में पुनर्मिलन तक एक सूत्र में बंधा रहा।
शकुंतला के भावपूर्ण अभिनय, दुष्यंत के राजसी ठाठ और ‘अंगूठी’ के प्रतीकात्मक नृत्य ने दर्शकों से खूब तालियां बटोरीं।

तालियों की गूंज में डूबा सभागार

सभागार दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था, और हर दृश्य पर करतल ध्वनि गूंज उठती थी।
सांस्कृतिक प्रेमियों ने कहा कि ऐसा लग रहा था मानो शकुंतला और दुष्यंत मंच पर नहीं, सच में जीवित हो उठे हों।

“नई पीढ़ी तक पहुंचाना था सपना”: अमिता खरे

प्रस्तुति के बाद अमिता खरे ने कहा:

“कालिदास की इस अमर कृति को कथक के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना मेरा सपना था, जो आज पूरा हुआ।”

शिष्याओं ने भी गुरु को नमन किया और कहा कि यह अनुभव उनके जीवन का सबसे बड़ा मंचन था।

सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाई

कालिदास समारोह में अभिज्ञान शाकुंतलम् की यह प्रस्तुति उज्जैन की सांस्कृतिक विरासत और कलात्मक परंपरा को नई ऊंचाई देने वाली साबित हुई।

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