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छतरपुर में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल, मरीज को ई-रिक्शा में ले जाना पड़ा, इलाज न मिलने से मौत

संवाददाता: इमरान खान

छतरपुर: स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के खजुराहो रोड इलाके में हलकन अहिरवार नामक मरीज को एंबुलेंस न मिलने के कारण ई-रिक्शा में ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ घर लाना पड़ा, लेकिन इलाज में देरी और सुविधाओं के अभाव में उनकी मौत हो गई। यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

परिजनों के अनुसार हलकन अहिरवार पिछले चार–पांच महीनों से गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें सांस लेने में परेशानी थी और उनका एक फेफड़ा खराब हो गया था। इलाज शुरू में नौगांव टीबी अस्पताल में हुआ, इसके बाद जिला अस्पताल और अंत में ग्वालियर रेफर किया गया। इस दौरान परिजनों को कई बार निजी एंबुलेंस का सहारा लेना पड़ा और दवाइयों व उपकरणों पर भारी खर्च करना पड़ा। मृतक की बेटी केशकली अहिरवार ने बताया कि आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद अस्पताल में केवल कुछ दवाइयां मिलीं, बाकी सभी दवाइयां और उपकरण उन्हें खुद खरीदने पड़े।

परिवार ने खर्च का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि दो ऑक्सीजन सिलेंडर ₹5,000 में खरीदे, सिलेंडर भरवाने का रोज़ाना खर्च ₹250–₹300, ई-रिक्शा में लाने-ले जाने का खर्च ₹1,200, रेगुलेटर की खरीदारी ₹1,200 और प्राइवेट एंबुलेंस ₹7,000 में ली गई। कुल मिलाकर अब तक लगभग ₹1.5 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, जबकि दो महीने से परिवार की मजदूरी भी बंद है।

केशकली अहिरवार ने आरोप लगाया कि जब मरीज की हालत बिगड़ी, तो जिला अस्पताल में भर्ती करने से मना कर दिया गया, ग्वालियर में भी दो दिन बाद डॉक्टरों ने इलाज से इंकार किया और बमीठा के एक प्राइवेट अस्पताल ने भी भर्ती नहीं किया। मजबूरी में मरीज को घर लाना पड़ा, जहां अंततः उनकी मौत हो गई।

स्थानीय जनप्रतिनिधि, ग्राम पंचायत पाए के सरपंच प्रतिनिधि नर्मद पटेल ने भी माना कि हलकन अहिरवार की मौत एंबुलेंस न मिलने और इलाज में देरी की वजह से हुई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे शासन से पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद दिलाने का प्रयास करेंगे।

परिजनों की नाराज़गी का मुख्य कारण यह भी है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं केवल कागजों में सक्रिय हैं और असली लाभ गरीब मरीजों तक नहीं पहुंचता। मृतक के भतीजे कैलाश अहिरवार का कहना है कि सरकारी एंबुलेंस सेवा केवल एक बार उपलब्ध करवाई जाती है, उसके बाद कोई मदद नहीं मिलती। अस्पताल में प्रारंभ में ऑक्सीजन दी गई, लेकिन बाद में देने से मना कर दिया गया, जिससे परिवार को मजबूरी में निजी सिलेंडर खरीदना पड़ा।

छतरपुर जिले की यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर खामियों को उजागर करती है। वायरल वीडियो और परिजनों के आरोपों के बावजूद अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह उठता है कि जब सरकारी योजनाएं ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुंचतीं, तो आम जनता का भरोसा किस पर टिकेगा।

खर्च का ब्योरा:

  • ऑक्सीजन सिलेंडर: ₹5,000
  • रोज़ाना रिफिलिंग: ₹250–₹300
  • रेगुलेटर: ₹1,200
  • ई-रिक्शा में लाना-ले जाना: ₹1,200
  • प्राइवेट एंबुलेंस: ₹7,000
  • कुल अनुमानित खर्च: लगभग ₹1.5 लाख

छतरपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था की यह पोल यह साफ दर्शाती है कि गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं अपर्याप्त और असंगठित हैं, और यदि सुधार न किया गया तो भविष्य में ऐसे हादसे दोहराए जा सकते हैं।

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