रिपोर्टर: आज़ाद सक्सेना
अमीर ज़मीन, बेसहारा लोग: बैलाडीला की पीड़ा
बैलाडीला क्षेत्र, जो देश को लौह अयस्क (Iron Ore) की समृद्ध संपदा प्रदान करता है, हर साल छत्तीसगढ़ सरकार को अरबों रुपये की रॉयल्टी देता है। एनएमडीसी की बचेली और किरंदुल खदानें इस क्षेत्र की पहचान हैं। लेकिन इस दौलत की चमक के पीछे एक गहरी मानवीय त्रासदी छिपी हुई है—यहां के नागरिकों को अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी व्यवस्था तक नसीब नहीं।
मुक्तिधाम की हालत बदहाल
बचेली और किरंदुल के बीच स्थित एकमात्र मुक्तिधाम की स्थिति चिंताजनक है। न तो वहां साफ-सफाई है, न शेड की व्यवस्था। जगह-जगह टूटी सीटें, बिखरा कचरा, और जर्जर संरचनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि यहां इंसानों को मरने के बाद भी सम्मानपूर्वक विदाई नहीं मिलती।
जिम्मेदार कौन?
इस मुक्तिधाम की स्थिति पर न नगरपालिका बचेली, न नगरपालिका किरंदुल, और न ही एनएमडीसी कोई ठोस जिम्मेदारी ले रहा है। जनप्रतिनिधि भी केवल आश्वासन की घिसी-पिटी भाषा में बात कर, कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता इस पूरे मसले को और दर्दनाक बना देती है।
चिराग तले अंधेरा की मिसाल
यह पूरा प्रकरण “चिराग तले अंधेरा” जैसी कहावत को जीवंत कर देता है। जिस ज़मीन से अरबों की कमाई होती है, वहां के मजदूर, व्यापारी और आम नागरिक—जो उस समृद्धि में भागीदार हैं—अपने अंतिम सफर के लिए भी एक सम्मानजनक जगह नहीं पा रहे। यह न केवल प्रशासनिक विफलता है बल्कि मानवीय संवेदना की हत्या भी है।
अब चाहिए संवेदनशील नेतृत्व और जागरूकता
इस विडंबना को दूर करने के लिए अब वक्त आ गया है कि:
- स्थानीय प्रशासन ठोस कदम उठाए
- एनएमडीसी और नगरपालिकाएं संयुक्त रूप से जिम्मेदारी लें
- जनप्रतिनिधि केवल आश्वासन न दें, बल्कि संसाधन और बजट आवंटन सुनिश्चित करें
- स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों को भी आवाज़ बुलंद करनी होगी





