दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पतंजलि को डाबर के खिलाफ च्यवनप्राश विज्ञापन दिखाने से रोका गया

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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पतंजलि को डाबर के खिलाफ च्यवनप्राश विज्ञापन दिखाने से रोका गया

बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद को दिल्ली हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने पतंजलि को डाबर इंडिया के च्यवनप्राश उत्पादों के खिलाफ टीवी विज्ञापन प्रसारित करने से रोक दिया है। यह आदेश डाबर की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया है।


क्या है पूरा मामला?

पतंजलि आयुर्वेद ने अपने विज्ञापनों में डाबर के च्यवनप्राश को नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया था। डाबर का आरोप है कि पतंजलि के विज्ञापन उनके ब्रांड को बदनाम कर रहे हैं और ग्राहकों को भ्रमित कर रहे हैं।

डाबर के आरोप:

  • पतंजलि के विज्ञापन भ्रामक और अपमानजनक हैं।
  • पतंजलि ने दावा किया कि उनके च्यवनप्राश में 51 जड़ी-बूटियाँ हैं, जबकि वास्तव में सिर्फ 47 ही हैं।
  • पतंजलि का दावा था कि असली च्यवनप्राश वही बना सकते हैं जिन्हें आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान हो — जिससे डाबर को घटिया ब्रांड दिखाया गया।
  • डाबर ने यह भी आरोप लगाया कि पतंजलि के उत्पाद में पारा (Mercury) है, जो बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है।

कोर्ट का रुख और अंतरिम आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने डाबर के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि पतंजलि तत्काल प्रभाव से ऐसे सभी विज्ञापन बंद करे जो डाबर की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु:

  • कोर्ट की सुनवाई 24 दिसंबर से शुरू हुई थी।
  • पतंजलि को पहले ही नोटिस भेजा गया था।
  • डाबर ने कोर्ट से अंतरिम राहत की मांग की थी।
  • अदालत ने कहा कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक पतंजलि ऐसे विज्ञापन टीवी पर नहीं दिखा सकता।

डाबर का बाज़ार में दबदबा

डाबर का च्यवनप्राश बाजार में सबसे आगे है, जिसकी हिस्सेदारी 61.6% है। यानी अधिकांश उपभोक्ता डाबर का ही च्यवनप्राश खरीदते हैं। डाबर ने कोर्ट में कहा कि पतंजलि जैसे ब्रांड के नकारात्मक प्रचार से उनकी ब्रांड वैल्यू और उपभोक्ता विश्वास को नुकसान पहुंचता है।


पतंजलि की प्रतिक्रिया अभी नहीं आई

इस मामले में पतंजलि आयुर्वेद की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, यह कोर्ट का फैसला ब्रांड इमेज और मार्केटिंग रणनीति पर बड़ा असर डाल सकता है।


दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले ने भ्रामक विज्ञापनों पर सख्त रुख दिखाया है। यह मामला न केवल ब्रांड्स की मार्केटिंग एथिक्स पर सवाल उठाता है, बल्कि उपभोक्ताओं के विश्वास और स्वास्थ्य से जुड़े गंभीर मुद्दों को भी उजागर करता है। पतंजलि को अब अपनी प्रचार नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, खासकर जब मामला कोर्ट तक पहुंच गया हो।

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